फर्जी लॉ डिग्री रैकेट केस में वकील की जमानत रद्द, आपराधिक इतिहास छिपाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग – SC

जमानत रद्द बनाम जमानत निरस्त: कानूनी अंतर स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी लॉ डिग्री रैकेट मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि जमानत याचिका में पूरा आपराधिक इतिहास शपथपत्र के साथ बताना अनिवार्य है।

फर्जी शैक्षणिक डिग्री, विशेषकर कानून की डिग्री से जुड़े कथित संगठित रैकेट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी मजहर खान को मिली जमानत रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि जमानत याचिका में आपराधिक इतिहास छिपाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

यह आपराधिक अपील जेबा खान की ओर से दायर की गई थी, जिसमें Allahabad High Court द्वारा 30 जुलाई 2025 को दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया।


“सिर्फ एक फर्जी डिग्री नहीं, संगठित गतिविधि का आरोप”

11 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“आरोप केवल एक फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं हैं। यह एक संगठित और योजनाबद्ध गतिविधि का हिस्सा है, जिसमें फर्जी शैक्षणिक योग्यताओं, विशेषकर कानून की डिग्री, का निर्माण, प्राप्ति और उपयोग शामिल है। इसका सीधा प्रभाव कानूनी पेशे की ईमानदारी और न्याय प्रणाली पर पड़ता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी डिग्री के आधार पर स्वयं को वकील के रूप में प्रस्तुत करता है, तो यह केवल निजी विवाद का मामला नहीं रह जाता, बल्कि इसका संस्थागत और सार्वजनिक प्रभाव होता है।


आपराधिक इतिहास छिपाना बना जमानत रद्द करने का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर करते समय यह दावा किया था कि वर्तमान एफआईआर के अलावा उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। जबकि रिकॉर्ड से पता चला कि उसके खिलाफ कुल 9 एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें:

  • धोखाधड़ी
  • जालसाजी
  • आपराधिक धमकी
  • दंगा
  • अन्य गंभीर अपराध

शामिल हैं, जिनमें से कुछ मामले 2011 तक के हैं।

कोर्ट ने कहा कि जमानत आदेश देते समय यदि न्यायालय को पूर्ण और सही जानकारी नहीं दी जाती, तो उसका निर्णय प्रभावित हो सकता है। साथ ही यह भी नोट किया गया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी पर “स्टॉकिंग और डराने-धमकाने” के आरोप भी लगे।

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जमानत याचिका में अनिवार्य खुलासा: सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

भविष्य में तथ्यों को छिपाने की प्रवृत्ति रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए:

  1. हर जमानत याचिकाकर्ता को अपना पूरा आपराधिक इतिहास बताना होगा।
  2. सभी लंबित एफआईआर और आपराधिक मामलों का खुलासा अनिवार्य होगा।
  3. किसी गैर-जमानती वारंट या अन्य कानूनी कार्रवाई की जानकारी देनी होगी।
  4. पूर्व में दायर जमानत याचिकाओं और उनके परिणाम बताने होंगे।
  5. यह समस्त जानकारी शपथपत्र (Affidavit) के साथ प्रस्तुत की जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि तथ्य छिपाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।


जमानत रद्द बनाम जमानत निरस्त: कानूनी अंतर स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला केवल जमानत मिलने के बाद स्वतंत्रता के दुरुपयोग का नहीं था, बल्कि हाईकोर्ट के आदेश की वैधानिकता की जांच का था।

अदालत ने पाया कि:

  • हाईकोर्ट ने ऑनलाइन मार्कशीट प्रिंटआउट जैसे विवादित दस्तावेजों पर भरोसा किया।
  • संबंधित विश्वविद्यालय और संस्थान के आधिकारिक पत्राचार को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

ऐसे में जमानत आदेश कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सकता।


पृष्ठभूमि: फर्जी लॉ डिग्री रैकेट का आरोप

मामला 23 अगस्त 2024 को सराय ख्वाजा थाना, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ। शिकायत के अनुसार एक संगठित गिरोह फर्जी शैक्षणिक डिग्रियां बेच रहा था।

आरोप था कि आरोपी ने दावा किया कि उसने वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से संबद्ध सर्वोदय ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।

हालांकि विश्वविद्यालय ने 10 अगस्त 2024 को स्पष्ट किया कि संबंधित संस्थान उससे संबद्ध नहीं है और ऐसी कोई मार्कशीट जारी नहीं की गई। संस्थान ने भी एलएलबी पाठ्यक्रम संचालित करने से इनकार किया।

अभियोजन का आरोप है कि आरोपी ने न केवल स्वयं फर्जी डिग्री का उपयोग किया, बल्कि दूसरों को भी ऐसी डिग्रियां दिलाने में सहायता की।

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जांच हस्तांतरण से इनकार

अपीलकर्ता ने जांच को विशेष एजेंसी को सौंपने की मांग भी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा:

  • जांच पूरी हो चुकी है
  • चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है
  • ट्रायल कोर्ट 26 मई 2025 से सुनवाई शुरू कर चुका है

अदालत ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद जांच का हस्तांतरण केवल असाधारण परिस्थितियों—जैसे स्पष्ट पक्षपात या उच्च स्तर की संलिप्तता—में ही संभव है, जो इस मामले में स्थापित नहीं हुई।


न्यायिक संदेश: जमानत का अधिकार असीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन जमानत आदेश न्यायिक अनुशासन और अपीलीय समीक्षा के अधीन हैं। यदि आदेश असंगत, अवैध या गंभीर तथ्यों की अनदेखी पर आधारित है, तो उसे रद्द करना न्यायालय का दायित्व है।

यह फैसला जमानत कानून और न्यायिक पारदर्शिता के संदर्भ में महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।


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