Justice Yashwant Verma of Allahabad High Court approached the Supreme Court, terming the report of the in-house investigation committee and the recommendation of impeachment as unconstitutional
सुप्रीम कोर्ट ने एक और संवेदनशील न्यायिक प्रकरण की सुनवाई के लिए दरवाज़ा खोला है—इस बार याचिकाकर्ता कोई और नहीं, बल्कि स्वयं एक उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट और पूर्व प्रधान न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग की सिफारिश को असंवैधानिक और अतिसीमित (ultra vires) करार दिया है।
यह याचिका संसद के आगामी मानसून सत्र (21 जुलाई से) के ठीक पहले दायर की गई है, ऐसे समय में जब महाभियोग की सिफारिश को लेकर संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
🔥 प्रसंग: दिल्ली में आवास पर आग, और नकदी की बरामदगी
विवाद की जड़ एक 14 मार्च, 2025 को दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर लगी आग है। दमकल कर्मियों ने आग बुझाते समय जली हुई नकदी की गड्डियां मिलने की सूचना दी थी। उस समय न्यायमूर्ति वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे, और वह स्वयं आवास पर मौजूद नहीं थे।
इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजय खन्ना ने 22 मार्च को एक तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति का गठन किया जिसमें शामिल थे:
- न्यायमूर्ति शील नागू (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट),
- न्यायमूर्ति जीएस संधवालिया (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट), और
- न्यायमूर्ति अनु शिवरामन (कर्नाटक हाईकोर्ट)।
⚖️ याचिका में न्यायमूर्ति वर्मा की प्रमुख आपत्तियां
1. प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
न्यायमूर्ति वर्मा ने आरोप लगाया कि उन्हें न तो सबूतों तक पहुंच दी गई, न ही सीसीटीवी फुटेज दिखाया गया, और न ही गवाहों से पूछताछ के समय उपस्थित रहने का मौका मिला। समिति ने एकपक्षीय ढंग से कार्य किया और बिना ठोस प्रमाण के नकारात्मक निष्कर्ष निकाल लिए।
2. पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष और प्रक्रिया की खामियां
उन्होंने कहा कि समिति ने पूर्व निर्धारित पूर्वग्रहों के साथ काम किया, और उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि सबूत के बोझ को उलटते हुए, समिति ने उनसे ही खुद को निर्दोष साबित करने की अपेक्षा की।
3. इन-हाउस प्रक्रिया का “संवैधानिक अतिक्रमण”
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की 1999 की फुल कोर्ट प्रस्ताव से गठित इन-हाउस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल आंतरिक अनुशासन और तथ्य-संग्रह तक सीमित था, परंतु इसे हटाने की सिफारिश तक ले जाना इसे संविधान के अनुच्छेद 124 और 218 में स्थापित प्रक्रिया से अलग और असंवैधानिक बनाता है।
“इन-हाउस प्रक्रिया एक समानांतर, अतिसंवैधानिक तंत्र बन जाती है, जो संसद के विशेषाधिकारों का अतिक्रमण करती है,” — याचिका में कहा गया।
4. संसदीय अधिकारों का अतिक्रमण
न्यायमूर्ति वर्मा ने यह भी कहा कि जब तक जजेज (इन्क्वायरी) अधिनियम, 1968 के तहत एक औपचारिक जांच नहीं होती, तब तक सुप्रीम कोर्ट महाभियोग की सिफारिश नहीं कर सकता। इन-हाउस समिति के निष्कर्ष और सीजेआई की सिफारिश संसद के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप है और संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन है।
📜 मांगें
- 3 मई, 2025 को प्रस्तुत इन-हाउस जांच रिपोर्ट को रद्द करने की मांग।
- 8 मई, 2025 को तत्कालीन सीजेआई द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई महाभियोग की सिफारिश को असंवैधानिक घोषित करने की मांग।
- पूरी इन-हाउस प्रक्रिया को अवैध और न्यायिक मूल्यों के विरुद्ध घोषित करने की मांग।
🧾 संवैधानिक प्रश्न जो उठे हैं
- क्या सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस प्रक्रिया महाभियोग की सिफारिश तक जा सकती है?
- क्या बिना औपचारिक शिकायत और न्यायिक जांच के किसी न्यायाधीश के खिलाफ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं?
- क्या यह प्रक्रिया संविधान में प्रदत्त जजों की सुरक्षा और संसदीय संप्रभुता के विपरीत है?
यह मामला आने वाले समय में न केवल न्यायिक जवाबदेही के प्रश्नों को पुनर्परिभाषित कर सकता है, बल्कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच की संविधानिक सीमाओं को भी पुनः स्पष्ट कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका पर दी गई प्रतिक्रिया, भारत के न्यायिक इतिहास में एक नई संवैधानिक व्याख्या का द्वार खोल सकती है।
