जैन प्रतिमा विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एटा से प्रयागराज म्यूजियम में सुरक्षित रखने का दिया आदेश

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जैन प्रतिमा विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एटा से प्रयागराज के सेंट्रल म्यूजियम भेजने का आदेश दिया, स्वामित्व विवाद जारी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एटा में मिली प्राचीन जैन प्रतिमा को सुरक्षित रखने और विशेषज्ञ जांच के लिए प्रयागराज के सेंट्रल म्यूजियम भेजने का आदेश दिया, स्वामित्व विवाद जारी।


ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधते हुए Allahabad High Court ने एटा जिले में मिली एक प्राचीन जैन प्रतिमा को लेकर महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। अदालत ने निर्देश दिया कि वर्तमान में पुलिस अभिरक्षा में रखी गई इस प्रतिमा को सुरक्षित संरक्षण और वैज्ञानिक परीक्षण के लिए प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय में स्थानांतरित किया जाए।

न्यायमूर्ति Ajit Kumar और न्यायमूर्ति Swarupama Chaturvedi की खंडपीठ जैन संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। मामला जैन समुदाय के दो प्रमुख पंथों—दिगंबर और श्वेतांबर—के बीच प्रतिमा की पहचान और स्वामित्व को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतिमा 9वीं–10वीं शताब्दी की प्रतीत होती है, जिससे इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। साथ ही, इसकी धार्मिक पहचान को लेकर उत्पन्न विवाद को देखते हुए इसका निष्पक्ष और विशेषज्ञ परीक्षण आवश्यक है।

पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि एटा के जिलाधिकारी प्रतिमा को पूर्ण सुरक्षा के साथ Central Museum Prayagraj में स्थानांतरित करें और वहां के निदेशक को विधिवत सुपुर्द करें। संग्रहालय को निर्देशित किया गया है कि प्रतिमा को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान पर रखा जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

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अदालत ने यह भी कहा कि संग्रहालय, Archaeological Survey of India के समन्वय से विशेषज्ञों की एक टीम गठित करेगा, जो प्रतिमा की प्रकृति, कालखंड और विशेष रूप से जैन पंथों से उसके संबंध का विस्तृत अध्ययन करेगी। इस टीम को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का लक्ष्य दिया गया है।

साथ ही, अदालत ने निर्देश दिया कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए। एटा के जिलाधिकारी को अगली सुनवाई पर प्रतिमा के हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेज (पजेशन मेमो) के साथ रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा गया है।

क्या है विवाद?

यह मामला एटा जिले में मिली एक जैन प्रतिमा के स्वरूप और पहचान से जुड़ा है, जिसे स्थानीय पुलिस ने अपने कब्जे में रखा हुआ था। प्रतिमा को लेकर दिगंबर और श्वेतांबर पंथों के बीच स्वामित्व का विवाद उत्पन्न हो गया, दोनों ही इसे अपने-अपने पंथ से संबंधित बता रहे हैं।

पहले Archaeological Survey of India की एक दो-सदस्यीय समिति ने निरीक्षण के बाद संकेत दिया था कि प्रतिमा श्वेतांबर परंपरा से संबंधित हो सकती है। हालांकि, बाद में किए गए विस्तृत परीक्षण में आगरा सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद् ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उपलब्ध प्रतीकों और शैलीगत विशेषताओं के आधार पर प्रतिमा को किसी एक पंथ से निश्चित रूप से जोड़ना संभव नहीं है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रतिमा की कई विशेषताएं दोनों पंथों में समान रूप से पाई जाती हैं, जिससे इसकी पहचान और अधिक जटिल हो जाती है।

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याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि Indian Treasure Trove Act 1878 के तहत, भूमि से प्राप्त इस प्रकार की वस्तु का संरक्षक कलेक्टर होता है, न कि पुलिस। ऐसे में पुलिस के पास प्रतिमा का रहना विधिसम्मत नहीं है और इसे उचित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत संभाला जाना चाहिए।

अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है—जहां एक ओर प्रतिमा की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है, वहीं दूसरी ओर उसकी वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच का मार्ग भी प्रशस्त किया गया है।

यह आदेश न केवल सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायालय संवेदनशील धार्मिक विवादों में तथ्य-आधारित समाधान को प्राथमिकता देते हैं।


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