चूड़ियां और शपथ से इनकार बना निर्णायक संकेत-कोर्ट ने चकबंदी अधिकारी के आदेश को सही ठहराया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के दशक पुराने भूमि विवाद में कहा—पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह करने वाली महिला पूर्व पति की संपत्ति पर वारिस नहीं रहती। कोर्ट ने चकबंदी अधिकारी के आदेश को सही ठहराया।
Allahabad High Court ने बस्ती जिले के एक दशक पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर लेती है, तो वह पूर्व पति की संपत्ति पर उत्तराधिकार (वरासत) का दावा नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति Chandra Kumar Rai की एकल पीठ ने जैजुला की याचिका खारिज करते हुए बंदोबस्त अधिकारी द्वारा भांजे हबीबुल्लाह के पक्ष में दर्ज की गई वरासत को सही ठहराया।
चूड़ियां और शपथ से इनकार बना निर्णायक संकेत
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिया। याची जैजुला ने कुरान उठाकर यह शपथ लेने से इनकार कर दिया कि उसने दूसरा निकाह नहीं किया है। अदालत ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि मुस्लिम समाज में विधवाएं सामान्यतः चूड़ियां नहीं पहनतीं।
कोर्ट ने पाया कि याची का चूड़ियां पहनना और निकाह संबंधी प्रश्न पर शपथ से बचना इस बात का मजबूत संकेत है कि उसने पुनर्विवाह किया था। ऐसे में वह अपने पहले पति की कानूनी वारिस नहीं रह सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार का अधिकार केवल विधवा की स्थिति पर आधारित होता है। यदि विवाह संबंध समाप्त हो चुका हो—चाहे तलाक से या पुनर्विवाह से—तो पूर्व पति की संपत्ति पर दावा स्वतः समाप्त हो जाता है।
चचेरे भाई की गवाही को वरीयता
मामले में मृतक लियाकत हुसैन के चचेरे भाई मोहम्मद जुबैर की गवाही को निर्णायक माना गया। उन्होंने अदालत को बताया कि लियाकत ने मृत्यु से पूर्व ही जैजुला को तलाक दे दिया था। इसके बाद जुबैर ने स्वयं उससे निकाह किया और बाद में उसे भी तलाक दे दिया।
कोर्ट ने Indian Evidence Act की धारा 50 का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी नातेदारी या पारिवारिक संबंध पर विवाद हो, तो उस व्यक्ति की राय सबसे प्रासंगिक मानी जाती है जिसे परिवार की संरचना और संबंधों की विशेष जानकारी हो।
पीठ ने माना कि चचेरे भाई का बयान सुसंगत, विश्वसनीय और कानूनी कसौटी पर खरा उतरता है।
चकबंदी कार्यवाही पर तकनीकी आपत्ति खारिज
याची की ओर से यह दलील दी गई थी कि विपक्षी हबीबुल्लाह ने उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम की धारा 12 के तहत अलग से आवेदन दाखिल नहीं किया था, बल्कि केवल आपत्ति प्रस्तुत की थी।
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि चकबंदी कार्यवाही में दीवानी वाद की तरह कठोर प्लीडिंग नियम लागू नहीं होते। यदि किसी व्यक्ति ने अपनी आपत्ति में वंशावली दी है और नाम दर्ज करने की स्पष्ट प्रार्थना की है, तो उसे विधिसम्मत आवेदन माना जाएगा।
अदालत ने पाया कि उप-संचालक चकबंदी और बंदोबस्त अधिकारी ने मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्यों का समुचित विश्लेषण किया था। इसलिए उनके आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
1982 से लंबित विवाद का पटाक्षेप
यह मामला वर्ष 1982 से लंबित था। हाईकोर्ट के ताजा निर्णय के साथ ही लंबे समय से चले आ रहे उत्तराधिकार विवाद का पटाक्षेप हो गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्विवाह के बाद महिला का पूर्व पति की संपत्ति पर अधिकार समाप्त हो जाता है, जब तक कि कानून या विशेष परिस्थितियां कुछ और न कहें।
व्यापक प्रभाव
यह फैसला विशेष रूप से उत्तराधिकार और पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में मार्गदर्शक माना जा रहा है। अदालत ने सामाजिक आचरण, शपथ से परहेज और पारिवारिक गवाही जैसे कारकों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर यह संकेत दिया है कि न्यायालय तथ्यात्मक परिस्थितियों की समग्र समीक्षा करता है।
इस निर्णय से स्पष्ट है कि उत्तराधिकार का दावा केवल नाममात्र के वैवाहिक संबंध पर नहीं, बल्कि वास्तविक वैधानिक स्थिति पर निर्भर करता है।
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