मोटर दुर्घटना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पूरी मुआवजा राशि देने का आदेश दिया, योगदानात्मक लापरवाही के निष्कर्ष को किया खारिज

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मोटर दुर्घटना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पूरी मुआवजा राशि देने का आदेश दिया, योगदानात्मक लापरवाही के निष्कर्ष को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पुराने मोटर दुर्घटना में अपने दोनों पैर गंवाने वाले बीडीओ के लिए मुआवजा बढ़ाया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक स्कूटर चालक पर लगाए गए योगदानात्मक लापरवाही (Contributory Negligence) के आरोप को खारिज कर दिया। यह मामला एक मोटर दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता (एक खंड विकास अधिकारी – BDO) की दोनों टांगें कट गई थीं

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह माना कि निचली अदालत (ट्रिब्यूनल) और हाईकोर्ट दोनों ने गलत तरीके से स्कूटर चालक को भी लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को पूरी मुआवजा राशि (₹16,00,000/-) का भुगतान किया जाए और बीमा कंपनी (इंश्योरर) इसकी जिम्मेदारी उठाए।


मामले की पृष्ठभूमि

इस दुर्घटना में खंड विकास अधिकारी (BDO) एक स्कूटर पर पीछे बैठे थे, जब एक लंबे ट्रेलर वाहन से टकराने के कारण उनकी दोनों टांगें कट गईं। उन्होंने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत ₹16,00,000/- के मुआवजे की मांग की थी।

मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (Motor Accidents Claims Tribunal) ने ₹7,50,000/- का मुआवजा तय किया, जिसमें से ₹4,50,000/- की राशि बीमा कंपनी को देनी थी और ₹3,00,000/- की राशि स्कूटर चालक (जो स्वयं स्कूटर का मालिक भी था) को देनी थी। न्यायाधिकरण का मानना था कि स्कूटर चालक के पास केवल एक “लर्नर लाइसेंस” था, इसलिए उसे अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी।

इसके बाद हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, यह कहते हुए कि स्कूटर चालक और ट्रेलर चालक दोनों की गलती थी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि BDO ने अपनी सरकारी हैसियत का दुरुपयोग करके स्कूटर चालक से लिफ्ट मांगी, जबकि वह जानता था कि उसके पास केवल लर्नर लाइसेंस है।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और फैसला

1. स्कूटर चालक पर योगदानात्मक लापरवाही का कोई ठोस आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • बीमा कंपनी ने न्यायाधिकरण में स्कूटर चालक की योगदानात्मक लापरवाही (Contributory Negligence) का कोई मुद्दा नहीं उठाया था।
  • हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों में मेल बैठाने की कोशिश में गलत निष्कर्ष निकाला।
  • पुलिस चार्जशीट में केवल ट्रेलर चालक को दोषी ठहराया गया था, जिसे बीमा कंपनी ने ट्रिब्यूनल में चुनौती भी नहीं दी।

अदालत ने Dulcina Fernandes बनाम Joaquim Xavier Cruz (2013) 10 SCC 646 मामले का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की लापरवाही साबित करनी होती है, केवल अनुमान के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।


2. केवल “लर्नर लाइसेंस” होने का मतलब लापरवाही नहीं

कोर्ट ने कहा कि अगर ट्रेलर चालक तेजी और लापरवाही से वाहन चला रहा था, तो यह तथ्य कि स्कूटर चालक के पास सिर्फ एक लर्नर लाइसेंस था, इसे लापरवाही का आधार नहीं माना जा सकता।

  • न्यायाधिकरण का यह मान लेना कि स्कूटर चालक ने सावधानी नहीं बरती, केवल एक काल्पनिक अनुमान था।
  • सड़क पर किसकी गलती थी, यह तथ्यों से साबित होना चाहिए, केवल संभावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता।

3. पूरी मुआवजा राशि दिए जाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को पूरा ₹16,00,000/- मुआवजा मिलना चाहिए।

  • दुर्घटना 1999 में हुई थी, इसलिए 2024 की परिस्थितियों के अनुसार मुआवजा तय करना अन्यायपूर्ण होता।
  • मामले की सुनवाई में हुई देरी की भरपाई के लिए अदालत ने 7% वार्षिक साधारण ब्याज (Simple Interest) देने का भी आदेश दिया।
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कोर्ट के अंतिम निर्देश

  1. ₹25,000/- की कटौती (धारा 140 के तहत पहले से प्राप्त राशि) के बाद शेष राशि याचिकाकर्ता को दी जाएगी।
  2. बीमा कंपनी को आदेश दिया गया कि वह मुआवजा राशि की गणना कर याचिकाकर्ता को सूचित करे।
  3. राशि का भुगतान आरटीजीएस/एनईएफटी (RTGS/NEFT) के माध्यम से दो महीने के भीतर किया जाए।
  4. याचिकाकर्ता को अपने बैंक खाता विवरण अदालत में जमा करने होंगे।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला Srikrishna Kanta Singh बनाम Oriental Insurance Co. Ltd. मामले में इस बात को दोहराता है कि लापरवाही का निर्धारण ठोस सबूतों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल अनुमान के आधार पर।
यह फैसला यह भी सुनिश्चित करता है कि मोटर दुर्घटना के पीड़ितों को न्याय मिल सके और उन्हें अनुचित रूप से योगदानात्मक लापरवाही का दोषी न ठहराया जाए।

वाद शीर्षक – श्रीकृष्ण कांता सिंह बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड।

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