शादी और बच्चे के बाद POCSO कार्यवाही रद्द: उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला

यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी के खिलाफ कार्यवाही रद्द की, यह देखते हुए कि वह और पीड़िता अब कानूनी रूप से विवाहित हैं और उनका एक बच्चा है। कोर्ट ने कहा—मुकदमा जारी रखना न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा।

Uttarakhand High Court ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए आरोपी के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने पाया कि आरोपी और पीड़िता अब विधिवत विवाहित हैं, उनका एक बच्चा है और महिला अपने पति के साथ शांतिपूर्वक रहना चाहती है।

न्यायमूर्ति Alok Verma ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में मुकदमे को जारी रखना या आरोपी को जेल भेजना परिवार को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देगा। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति में अभियोजन जारी रखना “न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा।”

‘प्रेम से प्रेरित, न कि वासना से’

कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि प्रकरण के तथ्यों से प्रतीत होता है कि संबंध प्रेम से प्रेरित था, न कि किसी शोषण या वासना से। पीड़िता स्वयं अपने पति के साथ रहना चाहती है और उसने अदालत के समक्ष यह इच्छा स्पष्ट रूप से व्यक्त की।

मामला POCSO के विशेष सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित था। आरोपी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपने विरुद्ध जारी आदेश पत्र और समन को निरस्त करने की मांग की थी।

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समझौता, विवाह और संतान

याचिका में कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका है और 12 मई 2023 को उन्होंने अपनी मर्जी से विवाह कर लिया। 27 अक्टूबर 2023 को उनके यहां पुत्र का जन्म हुआ।

पीड़िता की ओर से प्रस्तुत किया गया कि वह अब बालिग है, जिसकी पुष्टि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि से होती है। अदालत ने इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए माना कि वर्तमान परिस्थितियों में दांपत्य जीवन को तोड़ना न्यायसंगत नहीं होगा।

न्यायिक संतुलन का प्रश्न

POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से सख्त प्रावधान करता है। सामान्यतः ऐसे मामलों में समझौता या विवाह, अभियोजन समाप्त करने का आधार नहीं माना जाता।

हालांकि, इस मामले में हाईकोर्ट ने विशिष्ट तथ्यों—विवाह, संतान और पीड़िता की स्वतंत्र इच्छा—को ध्यान में रखते हुए हस्तक्षेप किया। अदालत ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य परिवारों को अनावश्यक रूप से विखंडित करना नहीं है, विशेषकर तब जब पीड़िता स्वयं दांपत्य जीवन जारी रखना चाहती हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ

ऐसे मामलों में न्यायालयों के दृष्टिकोण को लेकर बहस पहले भी होती रही है। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2025 में Supreme Court of India ने ‘समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध के टूटने को बलात्कार का आपराधिक मामला मानने से इंकार किया था। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि सहमति से स्थापित संबंध को बाद में विवादित कर दंडात्मक अपराध में नहीं बदला जा सकता।

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व्यापक प्रभाव

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर यह प्रश्न उठाता है कि POCSO जैसे कठोर कानूनों के अनुप्रयोग में न्यायालयों को किस हद तक सामाजिक और मानवीय परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए।

हालांकि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है, लेकिन यह आदेश बताता है कि अदालतें कानून के उद्देश्य और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों के बीच संतुलन साधने का प्रयास करती हैं।


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