नई दिल्ली, 2025: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि किरायेदार, जिसने किसी संपत्ति में किराया समझौते (Rent Deed) के तहत प्रवेश किया है, वह बाद में उस संपत्ति के मालिकाना हक को चुनौती नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना ‘डॉक्ट्रिन ऑफ एस्टॉपेल’ (Doctrine of Estoppel) के सिद्धांत के प्रतिकूल है। यह फैसला किरायेदारी विवादों के भविष्य के मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: किरायेदार अब नहीं चुनौती दे सकेगा मकान मालिक का मालिकाना हक, कोर्ट ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ एस्टॉपेल’ को ठहराया लागू
क्या है कोर्ट का सिद्धांत – ‘डॉक्ट्रिन ऑफ एस्टॉपेल’?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह समझाया कि जब कोई व्यक्ति किसी मकान या संपत्ति में किरायेदार के रूप में प्रवेश करता है और रेंट डीड पर हस्ताक्षर करता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि संपत्ति देने वाला व्यक्ति ही उसका वास्तविक मालिक है। ऐसे में, बाद में किरायेदार यह दावा नहीं कर सकता कि मकान मालिक का उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून इस प्रकार के विरोधाभासी दावे की अनुमति नहीं देता।
आसान शब्दों में कहा जाए तो, यदि आप किसी मकान में किराए पर रहते हैं और आपने रेंट एग्रीमेंट पर साइन किए हैं, तो आप यह मान चुके हैं कि वह व्यक्ति वैध मकान मालिक है। इसलिए, वर्षों बाद आप यह नहीं कह सकते कि मकान उसका नहीं है।
फैसला किस मामले में आया?
यह ऐतिहासिक निर्णय ज्योति शर्मा बनाम विष्णु गोयल (2025 INSC 1099) केस में दिया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदार के खिलाफ फैसला सुनाते हुए मकान मालिक को संपत्ति का कब्जा वापस दिलाने और जनवरी 2000 से बकाया किराया अदा करने का आदेश दिया। यह निर्णय अब आने वाले समान मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में उद्धृत किया जा सकेगा।
कोर्ट ने किन प्रमुख मुद्दों पर दी स्पष्टता
- मालिकाना हक पर किरायेदार का दावा अमान्य:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस किरायेदार या उसके परिवार ने 50 वर्षों से अधिक समय तक मूल मालिक को नियमित रूप से किराया दिया, वह अब मालिकाना हक को चुनौती नहीं दे सकता। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि एक “रिलिंक्विशमेंट डीड” (अधिकार त्याग पत्र) से भी मूल मालिक के अधिकारों की पुष्टि होती है। - मालिकाना हक के सबूत की कसौटी:
अदालत ने दोहराया कि किरायेदार को बेदखल करने के मुकदमे में मालिकाना हक के सबूत को उतनी सख्ती से परखा नहीं जाता, जितना कि किसी अलग मुकदमे में जहां मालिकाना हक की घोषणा ही विवाद का मुख्य मुद्दा हो। - वसीयत (Will) का महत्व:
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मकान मालिक के पक्ष में जो वसीयत (Will) प्रस्तुत की गई थी, उसे अदालत से प्रोबेट (Probate – कानूनी स्वीकृति) मिल चुकी थी। इस तथ्य को हाई कोर्ट ने नजरअंदाज किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने त्रुटिपूर्ण ठहराया। - मकान मालिक की वाजिब आवश्यकता:
अदालत ने यह दलील स्वीकार की कि मकान मालिक को अपनी वास्तविक व्यावसायिक आवश्यकता के लिए संपत्ति खाली चाहिए। उन्होंने अपने पति के मिठाई और नमकीन व्यवसाय को विस्तार देने की जरूरत का हवाला दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उचित और तर्कसंगत माना।
निचली अदालतों के आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा दिए गए उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनमें मकान मालिक के दावे को खारिज किया गया था। सर्वोच्च अदालत ने किरायेदार को न केवल बकाया किराया चुकाने का आदेश दिया, बल्कि किराया भुगतान में चूक और मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता के आधार पर संपत्ति खाली करने का भी निर्देश दिया।
फैसले का व्यापक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला किरायेदारी कानून में स्पष्टता लाएगा। अब कोई भी किरायेदार, जिसने किराया समझौते के तहत मकान मालिक को मान्यता दी है, बाद में उसके स्वामित्व पर प्रश्न नहीं उठा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय ‘डॉक्ट्रिन ऑफ एस्टॉपेल’ के तहत मकान मालिकों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है और किरायेदारी विवादों में न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है।
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