व्हाट्सऐप ग्रुप में हिंदू धर्म पर आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला: FIR रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पत्रकार द्वारा संचालित व्हाट्सऐप ग्रुप में हिंदू धर्म और ब्राह्मण समुदाय पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी पोस्ट करने के मामले में दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध दर्शाते हैं और जांच जारी रहेगी।


व्हाट्सऐप ग्रुप में हिंदू धर्म पर आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला: FIR रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्हाट्सऐप ग्रुप पर हिंदू धर्म और ब्राह्मण समुदाय को लेकर कथित आपत्तिजनक पोस्ट करने के मामले में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया है।

यह याचिका पत्रकार बुद्ध प्रकाश बौद्ध द्वारा दाखिल की गई थी, जो “BP Bauddh Patrakar News Group” व्हाट्सऐप समूह संचालित करते थे।


🔹 क्या था मामला?

26 सितंबर 2025 को याचिकाकर्ता ने ग्रुप में 7 पन्नों का संदेश साझा किया, जिसमें कथित रूप से:

  • “अच्छा हिंदू बनने के लिए बीफ सेवन आवश्यक था”
  • प्राचीन अनुष्ठानों में बैल की बलि और मांस सेवन का उल्लेख
  • “ब्राह्मण नियमित रूप से गौमांस खाते थे” जैसे दावे शामिल थे।

शिकायतकर्ता ने कहा कि:

  • ये टिप्पणियाँ भ्रामक, अपमानजनक और धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने वाली हैं।
  • गाय हिंदू धर्म में पूज्य है, इसलिए यह पोस्ट समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गहरी चोट पहुँचाती है।

इस आधार पर FIR दर्ज हुई, जिसमें BNS की धाराएँ:

  • 196(1)(b) — गलत जानकारी फैलाना
  • 299 — धार्मिक भावना भड़काना
  • 353(1)(c), 353(2) — सामाजिक सामंजस्य भंग करने जैसे आरोप लगाए गए।
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🔹 याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता ने कहा:

  • व्हाट्सऐप ग्रुप बंद (closed group) है, सार्वजनिक मंच नहीं।
  • उन्होंने केवल एक पुस्तक के अंश साझा किए, जिसे सरकार ने प्रतिबंधित नहीं किया।
  • पोस्ट का उद्देश्य शैक्षिक और अकादमिक था, न कि धार्मिक भावना भड़काना।

🔹 कोर्ट का विश्लेषण: FIR रद्द करने से साफ इनकार

जस्टिस मिलिंद रमेश फडके की एकल पीठ ने कहा:

✔ FIR पढ़ने मात्र से प्रथमदृष्टया अपराध के तत्व मौजूद

पोस्ट की सामग्री धार्मिक भावना भड़काने, सामाजिक अशांति उत्पन्न करने और गलत जानकारी फैलाने से संबंधित प्रतीत होती है।

✔ यह जांच का विषय कि पोस्ट “अकादमिक” थी या “उकसाने वाली”

कोर्ट ने कहा कि यह तय करने के लिए पूरा सबूत और जांच आवश्यक है:

  • क्या पोस्ट दुर्भावनापूर्ण थी?
  • क्या धार्मिक भावनाओं को आहत करने का इरादा था?
  • क्या यह केवल ज्ञान-विमर्श था या पब्लिक ट्रैंक्विलिटी को बाधित करने वाला?

ये बातें अभी तय नहीं की जा सकतीं।

✔ FIR रद्द कराने के लिए ‘counterblast’ होने का दावा पर्याप्त नहीं

“सिर्फ यह कहना कि FIR बदले की भावना से दर्ज की गई है, FIR रद्द करने का आधार नहीं बनता।”

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कोर्ट ने याद दिलाया कि:

  • FIR तभी रद्द हो सकती है जब उसमें कोई अपराध बनता ही न हो
  • या आरोप असंभव या मूर्खतापूर्ण हों
  • यह मामला उन श्रेणियों में नहीं आता।
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🔹 निर्णय

कोर्ट ने कहा कि:

  • FIR में लगाए गए आरोप संज्ञेय अपराध दर्शाते हैं
  • जांच आवश्यक है
  • इस स्तर पर FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं

🔴 याचिका खारिज


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