हाई कोर्ट ने ‘रेपिस्ट पति’ से शादी रद्द करने की महिला की याचिका सबूतों पर संदेह जताते हुए किया खारिज-

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बॉम्बे उच्च न्यायलय Bombay high court ने भायखला के रहने वाली 34 साल की महिला की शादी रद्द करने की अपील खारिज कर दी है. जिसमें महिला ने दावा किया गया है कि जब वह दसवीं क्लास में थी, तब से वह उसके साथ बदतमीजी, उत्पीड़न और यौन शोषण कर रहा है. उसने दावा किया है कि कुछ ‘प्रसाद’ देकर उसने जबरन शादी की गई थी.

न्यायमूर्ति केआर श्रीराम और न्यायमूर्ति पीके चव्हाण की पीठ ने शादी रद्द करने की महिला की अपील को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि, ‘हमें डर है कि हम अपीलकर्ता के इस तरह के सबूतों पर विश्वास नहीं कर सकते. इसे घटना की सच्चाई के रूप में स्वीकार करना मुश्किल है.

क्या है पूरा मामला-

दरअसल, महिला ने बांद्रा में फैमिली कोर्ट के 7 सितंबर, 2021 के आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायलय High Court का रुख किया था, जिसके द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 Hindu Marriage Act 1955 की धारा 12 (1) (सी) के तहत उसकी याचिका इस आधार पर शादी को रद्द करने के लिए थी कि शादी बल प्रयोग करके की गई थी. मिडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, महिला ने शादी को रद्द करने के लिए पारिवारिक न्यायलय Family Court का दरवाजा खटखटाया था और दावा किया था कि यह दबाव में और धोखाधड़ी को बढ़ावा देकर किया गया था. उसने दावा किया कि 37 साल के बिलासपुर निवासी उसके पति ने जनवरी/फरवरी 2003 में उसके साथ मारपीट की और उसकी अश्लील तस्वीरें भी लीं.

तस्वीरों को सार्वजनिक करने की धमकी देकर किया यौन शोषण-

महिला का यह भी दावा है कि वह जहां भी पढ़ने जाती और बाद में पंजाब नेशनल बैंक Punjab national Bank में काम करने के लिए जाती, वो उसका पीछा करता रहा. महिला का दावा है कि उसकी अश्लील तस्वीरों को सार्वजनिक करने और उसके परिवार के सदस्यों को चोट पहुंचाने की धमकी देकर यौन शोषण भी किया. बाद में, उसने कहा, वह उसके सहयोगियों और दोस्तों की मौजूदगी में गाली-गलौज और मारपीट करता रहा.

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उसने कहा कि 28 नवंबर, 2011 को जब वह पब्लिक सेक्टर के बैंक की धनोरा ब्रांच में तैनात थी, तो उसके पति ने उसके कार्यालय के लैंडलाइन नंबर पर कॉल किया और उसे बाहर मिलने के लिए कहा. महिला न चाहते हुए भी उससे मिलने के लिए बाहर गई, क्योंकि उसने धमकी दी थी कि अगर वह बाहर नहीं आई तो ब्रांच के अंदर एक सीन क्रिएट कर देगा.

महिला की कहानी पर कोर्ट ने विश्वास से इनकार-

महिला ने शादी को रद्द करने की मांग करते हुए दावा किया था कि यह शादी उसकी सहमति के बिना की गई थी. हालांकि, कोर्ट ने उसकी कहानी पर विश्वास करने से इनकार कर दिया. पीठ ने आश्चर्य जताया कि ‘कैसे उसने प्रसाद को आसानी से स्वीकार कर लिया और जबरन ले जाने के बावजूद खा लिया’ और वह इतने लंबे समय तक चुप क्यों रही. कोर्ट ने कहा, “यह समझ से बाहर है कि उसने अपने दोस्तों या सहकर्मियों को घटना का खुलासा क्यों नहीं किया, जो निश्चित रूप से पुलिस या -कम से कम वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करके कुछ प्रभावी कदम उठा सकते थे.”

पीठ ने कहा- अपीलकर्ता का ऐसा व्यवहार काफी अजीब है-

पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता का ऐसा व्यवहार काफी अजीब है और इसे उस महिला का स्वाभाविक आचरण नहीं कहा जा सकता है, जो न केवल प्रमुख है, बल्कि विज्ञान में परास्नातक के रूप में योग्य है और मुंबई जैसे शहर में स्वतंत्र रूप से सेवा कर रही है. कोई भी समझदार व्यक्ति उसके बयान पर विश्वास और स्वीकार नहीं करेगा. इसके अलावा, कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 (2) के तहत बल प्रयोग या धोखाधड़ी के आधार पर विवाह को रद्द करने के लिए याचिका दायर करने के लिए एक साल की सीमा Limitation को भी ध्यान में रखा है.

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न्यायमूर्ति के. आर. श्रीराम और न्यायमूर्ति पी. के. चव्हाण की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि महिला के दावों के समर्थन में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं था और अपीलकर्ता का सारा साक्ष्य ‘‘असम्भव, अविश्वसनीय और अस्वीकारणीय है.’’

पीठ ने महिला की शादी रद्द करने की अपील खारिज कर दी.