The Supreme Court will hear the petition to restore the state status of Jammu and Kashmir on August 8
सुप्रीम कोर्ट 8 अगस्त को एक अहम याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा देने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) B R Gawai की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और आग्रह किया कि याचिका की सूची से यह मामला न हटाया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने अनुरोध स्वीकार करते हुए आश्वस्त किया कि मामला 8 अगस्त की सूची में बना रहेगा।
यह याचिका कॉलेज शिक्षक ज़हूर अहमद भट और सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद मलिक द्वारा अधिवक्ता सोएब कुरैशी के माध्यम से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि भले ही अनुच्छेद 370 से संबंधित निर्णय में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा देने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
याचिका की प्रमुख बातें:
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 अगस्त 2023 को दिए गए आदेश के दस महीने बीत जाने के बावजूद राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया है।
- इससे न केवल जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे का भी उल्लंघन हो रहा है।
- यह भी कहा गया कि विधानसभा चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो चुके हैं, इसलिए राज्य का दर्जा बहाल करने में कोई सुरक्षा संबंधी खतरा नहीं है।
- अगर यह निर्देश शीघ्र नहीं दिए गए, तो इससे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को गंभीर क्षति पहुंचेगी।
संवैधानिक संदर्भ:
11 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रावधान मानते हुए केंद्र सरकार के 2019 के निर्णय को वैध ठहराया था। उस फैसले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया था कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा, हालांकि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में ही रखा जाएगा।
कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव 30 सितंबर 2024 तक कराए जाएं और राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल किया जाए।
याचिका में आग्रह किया गया कि: यदि सर्वोच्च न्यायालय समयबद्ध निर्देश जारी नहीं करता है, तो इससे जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति, लोकतांत्रिक ढांचे और नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। राज्य की पूर्ववर्ती स्थिति को बहाल करना न केवल संवैधानिक अपेक्षा है, बल्कि संघीय समरसता की रक्षा के लिए भी आवश्यक है।
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