‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ पर जोर: दिल्ली कोर्ट ने गूगल-मेटा को मानहानिकारक कंटेंट हटाने का आदेश

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दिल्ली की तिस हजारी अदालत ने गूगल और मेटा को 36 घंटे में कथित मानहानिकारक कंटेंट हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं, प्रतिष्ठा और निजता का भी संरक्षण जरूरी।


📌 पृष्ठभूमि: स्टर्लिंग बायोटेक विवाद से जुड़ा मानहानि मुकदमा

दिल्ली की Tis Hazari Courts में दायर एक दीवानी वाद में कारोबारी Manoj Kesarichand Sandesara ने विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कथित मानहानिकारक सामग्री को हटाने की मांग की।

यह मामला चर्चित Sterling Biotech bank fraud case से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता और उनके परिवार को कथित रूप से “फरार”, “बैंक धोखेबाज” और “मनी लॉन्ड्रिंग” से जुड़ा बताया गया।


⚖️ अदालत का आदेश: 36 घंटे में कंटेंट हटाने का निर्देश

सीनियर सिविल जज Richa Sharma ने एक ex-parte ad-interim injunction जारी करते हुए Google LLC और Meta Platforms सहित अन्य प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया कि:

  • संबंधित URLs को de-index, de-list और de-reference किया जाए
  • याचिकाकर्ता और उनके परिवार को विवाद से जोड़ने वाली सामग्री हटाई जाए
  • यह कार्रवाई 36 घंटे के भीतर पूरी की जाए

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में वे URLs भी शामिल होंगे जो वाद में विशेष रूप से सूचीबद्ध नहीं हैं।


🧾 वाद और तर्क: ‘फर्जी और भ्रामक’ रिपोर्टिंग का आरोप

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि:

  • मीडिया रिपोर्ट्स तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक हैं
  • इनसे उनकी प्रतिष्ठा और व्यवसायिक हितों को गंभीर नुकसान हुआ है
  • सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों और बाद के समझौते/कार्रवाई के बावजूद पुरानी खबरें अब भी प्रसारित हो रही हैं
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वरिष्ठ अधिवक्ता Hemant Shah ने तत्काल अंतरिम राहत की मांग करते हुए दलील दी कि ऑनलाइन सामग्री की निरंतर उपलब्धता से अपूरणीय क्षति हो रही है।


🔍 ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ और प्रतिष्ठा का अधिकार

अदालत ने अपने आदेश में “Right to be Forgotten” और Article 21 of the Constitution of India के तहत प्रतिष्ठा और निजता के अधिकार पर विशेष जोर दिया।

कोर्ट ने कहा कि:

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण (absolute) नहीं है
  • इसे व्यक्ति की प्रतिष्ठा और गरिमा के अधिकार के साथ संतुलित करना आवश्यक है

⚠️ ‘मीडिया ट्रायल’ पर चिंता: बिना निष्कर्ष के आरोप

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कई प्रकाशनों में याचिकाकर्ता को अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं था।

कोर्ट ने इसे “trial by media” की श्रेणी में रखते हुए कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से व्यक्ति की साख को गंभीर नुकसान हो सकता है।


⚖️ अंतरिम राहत का आधार: prima facie केस और अपूरणीय क्षति

अदालत ने पाया कि:

  • याचिकाकर्ता के पक्ष में prima facie case बनता है
  • balance of convenience भी उनके पक्ष में है
  • और सबसे महत्वपूर्ण, irreparable harm की संभावना है

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक मुआवजा इस तरह की क्षति की भरपाई नहीं कर सकता।


⏳ अगली कार्यवाही: नोटिस और समन जारी

अदालत ने:

  • प्रतिवादियों को समन और नोटिस जारी किया
  • अगली सुनवाई 20 अप्रैल 2026 निर्धारित की
  • याचिकाकर्ता को एक सप्ताह में आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया
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साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि ये टिप्पणियां केवल प्रारंभिक (prima facie) हैं और अंतिम निर्णय नहीं मानी जाएंगी।


📌 निष्कर्ष: डिजिटल युग में प्रतिष्ठा बनाम अभिव्यक्ति का संतुलन

यह आदेश डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और मीडिया के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि:

  • ऑनलाइन सामग्री की जिम्मेदारी गंभीर है
  • “Right to be Forgotten” अब न्यायिक रूप से मजबूत होता सिद्धांत बनता जा रहा है
  • और अदालतें प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए त्वरित हस्तक्षेप करने को तैयार हैं

यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा के बीच संतुलन की evolving jurisprudence को और स्पष्ट करता है।


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