ईडी का तर्क है कि ट्रायल कोर्ट के सामने केवल यह प्रश्न था कि CBI द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार मामले में आरोप तय किए जा सकते हैं या नहीं
दिल्ली आबकारी नीति मामले में 23 आरोपियों को डिस्चार्ज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश में ED के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग करते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। एजेंसी का कहना है कि उसे सुने बिना प्रतिकूल टिप्पणियाँ की गईं।
दिल्ली आबकारी नीति मामले में एक नया कानूनी मोड़ सामने आया है। Enforcement Directorate (ED) ने Delhi High Court का रुख करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश से कई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की है, जिसमें 27 फरवरी 2026 को 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया गया था।
ईडी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में एजेंसी की जांच को लेकर कई “अनावश्यक और व्यापक टिप्पणियाँ” कीं, जबकि वह उस कार्यवाही का पक्षकार ही नहीं थी और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया।
BNSS की धारा 528 के तहत दायर याचिका
ईडी ने यह याचिका Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita की धारा 528 के तहत दायर की है, जो पहले Code of Criminal Procedure की धारा 482 के समकक्ष थी।
याचिका में एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के कई पैराग्राफ—109, 1048 से 1052, 1062, 1083, 1106 और 1124 से 1132—को रिकॉर्ड से हटाने की मांग की है। ईडी का कहना है कि इन हिस्सों में उसकी मनी लॉन्ड्रिंग जांच पर “अत्यधिक और अनुचित टिप्पणियाँ” की गई हैं।
ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर की टिप्पणियाँ: ED
ईडी का तर्क है कि ट्रायल कोर्ट के सामने केवल यह प्रश्न था कि Central Bureau of Investigation (CBI) द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार मामले में आरोप तय किए जा सकते हैं या नहीं।
हालांकि, अदालत ने इस दायरे से आगे बढ़ते हुए ईडी की जांच और उसकी कार्यप्रणाली पर विस्तृत टिप्पणियाँ कर दीं। एजेंसी का कहना है कि ये टिप्पणियाँ बिना उसकी जांच सामग्री को देखे और बिना उसे सुने की गईं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
चुनावी वित्तपोषण पर अदालत की टिप्पणी पर आपत्ति
ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि चुनावी चंदे या चुनावी खर्च से जुड़े आरोपों की जांच का दायरा पहले Election Commission of India के पास होना चाहिए और जांच एजेंसियों को “चुनावी मैदान में प्रवेश” नहीं करना चाहिए।
ईडी का कहना है कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ डिस्चार्ज आवेदन पर निर्णय देने के लिए आवश्यक नहीं थीं और इससे एजेंसी की चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच प्रभावित हो सकती है।
PMLA के तहत गिरफ्तारी और अभियोजन पर भी टिप्पणी
ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की थी कि कुछ मामलों में एजेंसियां डिफॉल्ट बेल से बचने के लिए जल्दबाजी में अभियोजन शिकायत दाखिल कर देती हैं या अनुसूचित अपराध की जांच पूरी होने से पहले ही कठोर शक्तियों का इस्तेमाल करती हैं।
ईडी ने इन टिप्पणियों पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि ये न केवल एजेंसी की जांच पर सवाल उठाती हैं बल्कि Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत दिए गए वैधानिक अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित फैसलों के भी विपरीत हैं।
एजेंसी ने विशेष रूप से Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मनी लॉन्ड्रिंग एक स्वतंत्र अपराध है और इसकी जांच अनुसूचित अपराध की जांच या चार्जशीट दाखिल होने की प्रतीक्षा किए बिना भी की जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला CBI द्वारा अगस्त 2022 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें दिल्ली की आबकारी नीति 2021-22 के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित अनियमितताओं की जांच शुरू की गई थी।
इसके बाद Enforcement Directorate ने ECIR दर्ज कर Prevention of Money Laundering Act के तहत अलग से जांच शुरू की। जहां CBI ने कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, वहीं ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में अभियोजन शिकायत और कई पूरक शिकायतें दायर कीं।
हाईकोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणी
इस मामले में पहले सुनवाई करते हुए Delhi High Court ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जांच एजेंसी के खिलाफ की गई टिप्पणियाँ प्रथम दृष्टया “मूल रूप से गलत समझ पर आधारित” प्रतीत होती हैं, खासकर तब जब मामला केवल आरोप तय करने के चरण में था।
हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के प्रभाव पर फिलहाल रोक लगा दी है और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही, जांच अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणियों को अगली सुनवाई तक स्थगित रखने का निर्देश दिया है।
अब इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट यह तय करेगा कि क्या ट्रायल कोर्ट के आदेश में की गई टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाया जाना चाहिए।
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