POSH Act क्या वकील महिलाओं पर लागू होता है? सुप्रीम कोर्ट ने SCWLA की याचिका पर नोटिस जारी किया

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सुप्रीम कोर्ट ने SCWLA की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें मांग की गई है कि POSH Act अदालतों में प्रैक्टिस करने वाली महिलाओं पर भी लागू माना जाए और बार काउंसिल/बार एसोसिएशनों को ICC गठित करना अनिवार्य किया जाए। मामला कानूनी पेशे में यौन उत्पीड़न संरक्षण के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।


POSH Act क्या वकील महिलाओं पर लागू होता है? सुप्रीम कोर्ट ने SCWLA की याचिका पर नोटिस जारी किया

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें यह घोषित करने की मांग की गई है कि यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (POSH Act), 2013 अदालतों में अभ्यास करने वाली महिला वकीलों पर भी लागू होता है, और देशभर की बार काउंसिल्स व बार एसोसिएशनों के लिए Internal Complaints Committees (ICCs) का गठन करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

यह याचिका Supreme Court Women Lawyers Association (SCWLA) द्वारा दायर की गई है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 जुलाई 2025 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने कहा था कि POSH Act बार काउंसिल्स के समक्ष महिला वकीलों की शिकायतों पर लागू नहीं होता क्योंकि वे परिषद की कर्मचारी नहीं हैं।


🔹 SCWLA का तर्क: POSH Act सिर्फ “कर्मचारी महिलाओं” तक सीमित नहीं

सीनियर एडवोकेट महालक्ष्मी पावनी ने दलील दी कि—

  • POSH Act की प्रस्तावना के अनुसार इसका उद्देश्य “सभी कार्यस्थलों पर सभी महिलाओं”—चाहे वे कर्मचारी हों या न हों—की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
  • अधिनियम की परिभाषाएँ —
    • Section 2(a): Aggrieved Woman,
    • Section 2(o): Workplace
      — दोनों ही स्वतंत्र पेशेवरों को भी अपने दायरे में लाती हैं।
  • अदालती परिसर, बार काउंसिल, बार एसोसिएशन, चेंबर, कोर्ट कॉरिडोर—ये सभी workplace की श्रेणी में आते हैं।
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उन्होंने कहा कि वकील महिलाओं के लिए POSH Act ही वह कानून है जो—

  • गोपनीयता,
  • समयबद्ध जांच,
  • अपील,
  • और सुरक्षा उपाय प्रदान करता है। Advocates Act, 1961 में ये सभी सुरक्षाएँ नहीं हैं।

🔹 बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला क्यों चुनौती के दायरे में?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि—

  • चूंकि बार काउंसिल वकीलों की “employer” नहीं है,
  • इसलिए POSH Act लागू नहीं हो सकता।

SCWLA ने इसे गलत और असंवैधानिक व्याख्या बताया और निम्नलिखित सुप्रीम कोर्ट निर्णयों का हवाला दिया—

इन फैसलों ने यह स्पष्ट किया कि यौन उत्पीड़न रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ औपचारिक रोजगार संबंधों तक सीमित नहीं है।


🔹 स्वतंत्र महिला वकील भी POSH Act के दायरे में—GSICC का उदाहरण

याचिकाओं में यह भी बताया गया कि—

  • सुप्रीम कोर्ट की Gender Sensitisation & Internal Complaints Committee (GSICC)
  • और विभिन्न हाईकोर्टों की समितियाँ

स्वतंत्र रूप से अभ्यास करने वाली महिला वकीलों की POSH शिकायतें सुनती हैं—
हालाँकि उनके साथ न तो नियोक्ता–कर्मचारी संबंध होता है और न ही कोई रोजगार अनुबंध।

इससे स्पष्ट है कि POSH Act का वास्तविक दायरा कहीं व्यापक है।


🔹 सुप्रीम कोर्ट: मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी

जस्टिस BV नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने माना कि—

“यह मुद्दा पूरे देश की महिला प्रैक्टिशनर्स पर प्रभाव डालता है और अत्यंत गंभीर विचार की आवश्यकता है।”

कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर प्रतिक्रिया मांगी है।

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🔹 क्या मांग की गई?

SCWLA ने कोर्ट से अंतरिम आदेश की मांग की है कि—

  • सभी राज्य बार काउंसिल्स,
  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया,
  • सभी बार एसोसिएशंस

विवाद के अंतिम निर्णय तक ICCs का गठन और संचालन जारी रखें


🔹 कौन उपस्थित था?

  • महालक्ष्मी पावनी, वरिष्ठ अधिवक्ता — SCWLA की ओर से
  • स्नेहा कालिता, AOR
  • एडवोकेट सीमा जोशी — टैग्ड याचिका में

कोर्ट ने प्रत्यर्थियों को विस्तृत उत्तर दाखिल करने के लिए समय दिया है।


अगला कदम

मामला विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होगा।
यह फैसला भारत की कानूनी बिरादरी में कार्यस्थल सुरक्षा, यौन उत्पीड़न की परिभाषा और पेशेवर निकायों की जवाबदेही पर दूरगामी असर डाल सकता है।


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