सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों में पीड़िता की उम्र का निर्धारण ट्रायल के दौरान होगा, जमानत स्तर पर नहीं। हाईकोर्ट द्वारा अनिवार्य मेडिकल जांच के निर्देश रद्द।
नई दिल्ली | कानूनी संवाददाता
POCSO मामलों में पीड़िता की उम्र का निर्धारण ट्रायल का विषय, जमानत स्तर पर नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण अपील मामले में यह स्पष्ट किया है कि पीड़िता की उम्र का निर्धारण जमानत (बेल) के स्तर पर नहीं, बल्कि ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि जमानत अदालत इस स्तर पर न तो साक्ष्यों की गहन जांच कर सकती है और न ही चिकित्सकीय उम्र निर्धारण को अनिवार्य कर सकती है।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने State of Uttar Pradesh v. Anurudh (2026) मामले में सुनाया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें POCSO मामलों में जांच की शुरुआत में ही पीड़िता की मेडिकल उम्र जांच को अनिवार्य कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
इस प्रकरण में अभियुक्त पर IPC की धारा 363 और 366 तथा POCSO अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत आरोप लगाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
हालांकि, वर्ष 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत सुनवाई के दौरान, अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जालौन को मेडिकल बोर्ड गठित कर पीड़िता की उम्र निर्धारित करने का निर्देश दिया। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से अधिक मानी गई और अभियुक्त को अंतरिम जमानत दे दी गई।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि पुलिस और ट्रायल कोर्ट POCSO मामलों में अक्सर उम्र निर्धारण को लेकर गंभीर चूक करते हैं, जिससे सहमति पर आधारित किशोर संबंधों को भी अपराध के दायरे में ला दिया जाता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्यभर में अनिवार्य मेडिकल उम्र जांच के निर्देश जारी किए थे।
विवाद का मुख्य प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि—
- क्या हाईकोर्ट को धारा 439 CrPC के तहत जमानत अधिकार क्षेत्र में रहते हुए, सभी POCSO मामलों में अनिवार्य रूप से उम्र निर्धारण की मेडिकल जांच कराने का निर्देश देने का अधिकार है?
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- धारा 439 CrPC के तहत हाईकोर्ट और सत्र न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल यह तय करने तक सीमित है कि अभियुक्त को जमानत दी जाए या नहीं।
- जमानत अदालत न तो “मिनी ट्रायल” कर सकती है और न ही साक्ष्यों की प्रमाणिकता का परीक्षण कर सकती है।
कोर्ट ने कहा कि POCSO अधिनियम की धारा 2(d) के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति ही “बालक” है। लेकिन POCSO अधिनियम स्वयं पीड़िता की उम्र निर्धारण की कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं करता। ऐसे मामलों में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 94 लागू होती है।
धारा 94 के तहत—
- जन्म प्रमाण पत्र
- स्कूल रिकॉर्ड
- अन्य वैधानिक दस्तावेज
को प्राथमिकता दी जाती है, और मेडिकल उम्र जांच अंतिम विकल्प है, न कि पहली शर्त।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन दस्तावेजों की सत्यता और उनके खिलाफ साक्ष्य प्रस्तुत करना केवल ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। जमानत अदालत इन पर विवाद का निपटारा नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट के आदेश पर कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट—
- जमानत अधिकार क्षेत्र में रहते हुए
- विधायी मंशा के विपरीत
- अनिवार्य मेडिकल उम्र जांच के निर्देश जारी नहीं कर सकता
इसलिए हाईकोर्ट का आदेश coram non judice (अधिकार क्षेत्र से बाहर) था और उसे रद्द किया जाता है।
POCSO कानून के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम के दुरुपयोग पर भी गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि—
“POCSO अधिनियम बच्चों की सुरक्षा के लिए बना एक अत्यंत पवित्र कानून है, लेकिन जब इसका उपयोग बदले की भावना या निजी हिसाब-किताब चुकाने के लिए किया जाता है, तो न्याय की अवधारणा ही उलट जाती है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि समाज में एक ओर ऐसे बच्चे हैं जो डर, गरीबी और सामाजिक कलंक के कारण न्याय से वंचित रह जाते हैं, वहीं दूसरी ओर संपन्न और प्रभावशाली लोग कानून का दुरुपयोग कर लाभ उठाते हैं।
इसी संदर्भ में अदालत ने धारा 498A IPC और दहेज कानूनों के दुरुपयोग का भी उल्लेख किया और न्यायालयों व अधिवक्ताओं को अधिक जिम्मेदारी से काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
केंद्र सरकार को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि—
- POCSO कानून के दुरुपयोग को रोकने के उपायों पर विचार किया जा सके
- सहमति पर आधारित किशोर संबंधों के लिए “रोमियो-जूलियट क्लॉज” जैसे प्रावधान लाने पर विचार हो
- कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ जवाबदेही तय की जा सके
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