दया नियुक्ति अनंत अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 साल बाद की याचिका खारिज की

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Mercy appointment not an eternal right: Delhi HC dismisses plea after 18 years

📰 विधि संवाददाता

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दया नियुक्ति (Compassionate Appointment) की मूल भावना को दोहराते हुए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में नियुक्ति की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर दिया, जो याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मृत्यु के लगभग 18 वर्ष बाद दाखिल की थी। न्यायालय ने साफ कहा कि दया नियुक्ति न तो नियमित भर्ती का विकल्प है और न ही पीढ़ीगत अधिकार।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने कहा:

“दया नियुक्ति कोई स्थायी अधिकार नहीं है जो समय बीतने तक बना रहे। यह केवल एक विशेष आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए दी जाती है, जो समय के साथ समाप्त हो जाती है।”

📌 पृष्ठभूमि:

  • याचिकाकर्ता के पिता 21 सितंबर 1988 को CISF कांस्टेबल के रूप में सेवा के दौरान दिवंगत हो गए थे।
  • उनकी पत्नी (याचिकाकर्ता की मां) ने साल 2000 में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन आवश्यक योग्यता के अभाव में उसे खारिज कर दिया गया।
  • इसके बाद 2018 में, बेटे ने खुद को योग्य बताकर दोबारा नौकरी के लिए आवेदन किया।

⚖️ अदालत का विश्लेषण:

  • अदालत ने 18 साल की देरी को अनुचित ठहराया और कहा: “अगर मृत्यु के कई वर्षों बाद इस प्रकार के आवेदन स्वीकार किए जाने लगे, तो यह दया नियुक्ति की मूल भावना को समाप्त कर देगा और इसे एक वैकल्पिक भर्ती माध्यम बना देगा।”
  • पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जैसे:
  • न्यायालय ने दोहराया कि दया नियुक्ति एक “मानवीय अपवाद” है, जो सिर्फ सरकारी कर्मचारी की आकस्मिक मृत्यु के कारण उत्पन्न तत्काल आर्थिक संकट को दूर करने के लिए है। यह संवैधानिक अधिकार नहीं है और इसे असीमित समय तक दावा नहीं किया जा सकता
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✔️ निष्कर्ष:

  • दया नियुक्ति का उद्देश्य तुरंत राहत है, न कि पीढ़ियों के लिए आरक्षित अवसर।
  • अत्यधिक देरी, बिना विशेष कारण के, न्यायिक स्वीकृति योग्य नहीं है।
  • न्यायालय ने CISF और केंद्र सरकार के खिलाफ याचिका खारिज कर दी

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