मकोका केस में काला जठेरी को डिफॉल्ट बेल से इनकार, रोहिणी कोर्ट का फैसला
रोहिणी कोर्ट ने मकोका मामले में काला जठेरी की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा—चार्जशीट से पहले जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी दायर होने से बेल का अधिकार नहीं बनता।
काला जठेरी को डिफॉल्ट बेल नहीं
Rohini Court ने मकोका (MCOCA) मामले में आरोपी संदीप उर्फ काला जठेरी की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज कर दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी समय रहते दायर की जा चुकी थी, इसलिए आरोपी को डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं बनता।
कोर्ट ने क्या कहा
मामले की सुनवाई करते हुए स्पेशल जज (MCOCA) Judge Muneesh Garg ने कहा:
“चूंकि अभियोजन पक्ष द्वारा जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी आरोपी की डिफॉल्ट बेल याचिका से पहले दायर की गई थी, इसलिए आरोपी को डिफॉल्ट बेल का अधिकार प्राप्त नहीं होता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी की याचिका “मेरिट से रहित” है और इसे खारिज किया जाता है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला 2024 में Aman Vihar Police Station में दर्ज FIR से जुड़ा है, जिसमें काला जठेरी पर संगठित अपराध से जुड़े आरोप लगे हैं।
आरोपी ने यह कहते हुए डिफॉल्ट बेल मांगी थी कि तय समय सीमा के भीतर न तो चार्जशीट दाखिल की गई और न ही जांच अवधि बढ़ाने का कोई वैध आदेश पारित हुआ।
डिफॉल्ट बेल की मांग पर क्या था तर्क
काला जठेरी की ओर से अधिवक्ता रोहित कुमार दलाल ने दलील दी कि:
- जांच अवधि 5 मार्च 2026 को समाप्त हो गई थी
- उस समय तक न चार्जशीट दाखिल हुई थी और न ही सक्षम अदालत द्वारा जांच अवधि बढ़ाई गई थी
- अभियोजन की अर्जी एक ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर की गई थी, जिसे मकोका के तहत अधिकार नहीं था
इसलिए, बचाव पक्ष के अनुसार, आरोपी को डिफॉल्ट बेल का वैधानिक अधिकार मिलना चाहिए था।
अभियोजन पक्ष का जवाब
विशेष लोक अभियोजक Akhand Pratap Singh ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि:
- 2 मार्च 2026 को ही जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी दायर कर दी गई थी
- यह अर्जी ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष परिस्थितियों के कारण दाखिल की गई
- बाद में इसे संबंधित स्पेशल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया
उन्होंने कहा कि अभियोजन ने समयसीमा के भीतर आवश्यक कदम उठाए थे।
ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष अर्जी पर कोर्ट का रुख
कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर अर्जी अमान्य है।
अदालत ने कहा कि छुट्टियों की अचानक घोषणा के कारण अभियोजन के पास ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष अर्जी दाखिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन ने समय सीमा समाप्त होने से पहले ही अर्जी दायर कर दी थी और इसमें कोई लापरवाही नहीं थी।
‘De Facto Doctrine’ का सहारा
अदालत ने अपने फैसले में “De Facto Doctrine” का भी हवाला दिया, जो सार्वजनिक नीति और आवश्यकता पर आधारित सिद्धांत है।
कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर अर्जी को “अस्तित्वहीन” नहीं माना जा सकता, खासकर जब वह आपात परिस्थितियों में दाखिल की गई हो।
कोर्ट का निष्कर्ष
अदालत ने पाया कि:
- अभियोजन ने समय रहते जांच अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी
- डिफॉल्ट बेल की याचिका बाद में दायर की गई
- इसलिए आरोपी को डिफॉल्ट बेल का कोई अधिकार नहीं बनता
निष्कर्ष: डिफॉल्ट बेल के अधिकार की सीमाएं स्पष्ट
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार पूर्ण नहीं है और यह इस बात पर निर्भर करता है कि अभियोजन ने समय सीमा के भीतर क्या कदम उठाए हैं।
यदि जांच अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया समय रहते शुरू कर दी जाती है, तो आरोपी को स्वतः डिफॉल्ट बेल का लाभ नहीं मिल सकता।
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