कोर्ट ने इसे “बेहद गंभीर” आचरण बताते हुए पूछा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल एडमिशन केस की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के पिता द्वारा उनके परिवार से संपर्क करने पर कड़ी नाराजगी जताई और अवमानना कार्रवाई की चेतावनी दी।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित करने की कोशिश पर सख्त रुख
Supreme Court of India ने मेडिकल दाखिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कथित कोशिश पर कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant ने याचिकाकर्ता के पिता द्वारा उनके परिवार से संपर्क करने पर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे न्यायपालिका की गरिमा पर गंभीर हमला बताया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की हरकतें न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करती हैं और इस पर अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए, इस पर विचार किया जाएगा।
आदेश के बाद CJI के परिवार को फोन, कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि उनके मुवक्किल के पिता ने आदेश पारित होने के बाद उनके भाई को फोन कर सवाल किया कि ऐसा आदेश कैसे दिया गया।
अदालत ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या कोई व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देगा कि उन्हें कैसा आदेश देना चाहिए। कोर्ट ने इसे “बेहद गंभीर” आचरण बताते हुए पूछा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
CJI ने सख्त शब्दों में कहा कि इस तरह के प्रयास न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के समान हैं और ऐसे मामलों से निपटना अदालत को भलीभांति आता है।
वकील को भी दी गई सख्त नसीहत
याचिकाकर्ता के वकील ने इस घटना की जानकारी न होने की बात कही और अदालत से माफी मांगी। इस पर पीठ ने कहा कि यदि मुवक्किल अनुचित आचरण कर रहा है तो वकील का दायित्व है कि वह पहले तथ्यों की जांच करे।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में वकील को केस से अलग होने पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने संकेत दिया कि मामले में अन्य अधिकारियों को प्रभावित करने की कोशिश भी की गई हो सकती है।
मेडिकल एडमिशन विवाद: क्या है मामला
मामला उत्तर प्रदेश के Subharti Medical College से जुड़ा है, जहां दो सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों ने पीजी मेडिकल कोर्स में बौद्ध अल्पसंख्यक कोटे के तहत प्रवेश की मांग की है।
यह संस्थान एक अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान घोषित है, जिसके तहत विशेष कोटे में प्रवेश का प्रावधान है।
धर्म परिवर्तन पर कोर्ट पहले ही जता चुका है संदेह
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया है और इसके समर्थन में उप मंडल अधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया है। हालांकि, पूर्व सुनवाई में Supreme Court of India ने इस दावे पर संदेह जताया था।
अदालत ने कहा था कि यह धर्म परिवर्तन वास्तविक आस्था के बजाय अल्पसंख्यक कोटे का लाभ लेने की कोशिश प्रतीत होता है।
अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र की जांच के आदेश
मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही आदेश दिया था कि याचिकाकर्ताओं के अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र की जांच की जाए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि दोनों अभ्यर्थी ‘पूनिया’ जाति से हैं और अचानक धर्म परिवर्तन कर अल्पसंख्यक कोटे का लाभ लेने का प्रयास संदिग्ध है।
न्यायपालिका की सख्त चेतावनी
आज की सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सर्वोपरि है और इसे किसी भी कीमत पर बनाए रखा जाएगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख बताता है कि न्यायपालिका अपने कामकाज में किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को गंभीरता से लेती है। मेडिकल एडमिशन विवाद से आगे बढ़कर यह मामला अब न्यायिक गरिमा और प्रक्रिया की शुचिता से भी जुड़ गया है।
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