ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुषों और सेक्स वर्कर्स के रक्तदान पर प्रतिबंध, केंद्र ने Supreme Court को बताया

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भारत में ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुषों और सेक्स वर्कर्स के रक्तदान पर प्रतिबंध से जुड़ा मामला इस समय Supreme Court of India में विचाराधीन है। गुरुवार को केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि फिलहाल यह प्रतिबंध जारी रखा जाएगा

नीचे इस पूरे मामले की कानूनी स्थिति और बहस को समझना आसान होगा:


1️⃣ मामला क्या है?

याचिकाओं में नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (NBTC) के 2017 के दिशा-निर्देशों को चुनौती दी गई है।

  • National Blood Transfusion Council ने “Blood Donor Selection and Blood Donor Referral Guidelines, 2017” जारी किए थे।
  • इन दिशानिर्देशों के क्लॉज 12 और 51 में कहा गया है कि:
    • ट्रांसजेंडर व्यक्ति
    • समलैंगिक पुरुष (MSM)
    • महिला सेक्स वर्कर्स
    को HIV/एड्स संक्रमण के “उच्च जोखिम वाले वर्ग” में रखा गया है।
  • इसी आधार पर उनके रक्तदान करने पर स्थायी रोक लगाई गई।

2️⃣ केंद्र सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?

भारत सरकार की ओर से Aishwarya Bhati (Additional Solicitor General) ने कहा:

  • विशेषज्ञों की समिति ने इस मुद्दे पर विचार किया।
  • यदि प्रतिबंध को ढीला किया गया तो
    रक्त प्राप्त करने वाले मरीजों के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है
  • इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध बनाए रखना जरूरी है

3️⃣ सुप्रीम कोर्ट की बेंच

मामले की सुनवाई जिस पीठ ने की उसमें शामिल थे:

  • Surya Kant – चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया
  • Joymalya Bagchi – जस्टिस
  • Vipul Pancholi – जस्टिस
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बेंच ने फिलहाल सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने में खास रुचि नहीं दिखाई


4️⃣ कोर्ट की मुख्य टिप्पणी

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Jayna Kothari से कहा:

  • देश में लाखों गरीब लोग मुफ्त रक्तदान पर निर्भर हैं
  • वे महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते।
  • अगर संक्रमण का 1% भी जोखिम हो तो
    उसका असर इन गरीब मरीजों पर पड़ेगा

अदालत का संकेत था कि रक्त सुरक्षा (blood safety) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


5️⃣ याचिकाकर्ताओं का तर्क

LGBTQ+ समुदाय के याचिकाकर्ताओं का कहना है:

  • यह प्रतिबंध भेदभावपूर्ण है।
  • आधुनिक तकनीक से HIV टेस्टिंग संभव है, इसलिए
    किसी समुदाय को blanket ban देना अनुचित है।
  • यह संवैधानिक अधिकारों (समानता, गरिमा) का उल्लंघन है।

संक्षेप में:

  • केंद्र सरकार प्रतिबंध हटाने के पक्ष में नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट फिलहाल नीति में दखल देने के लिए तैयार नहीं दिख रहा।
  • मामला अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है और याचिकाएं लंबित हैं।

अगर आप चाहें तो मैं यह भी समझा सकता हूँ:

  • दुनिया के दूसरे देशों में समलैंगिक पुरुषों के रक्तदान पर क्या नियम हैं
  • और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने असली संवैधानिक सवाल क्या हैं (जो काफी दिलचस्प हैं)।

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