सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि लंबित मामलों के लिए केवल जज जिम्मेदार नहीं, बल्कि वकीलों की लंबी बहस और स्थगन भी देरी का बड़ा कारण हैं।
भारत में बढ़ते लंबित मामलों को लेकर जारी बहस के बीच Justice Ahsanuddin Amanullah ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायिक देरी के लिए पूरी तरह न्यायाधीशों को जिम्मेदार ठहराना एकतरफा दृष्टिकोण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय वितरण प्रणाली में देरी का बड़ा कारण वकीलों द्वारा मामलों की पैरवी और संचालन का तरीका भी है।
🔹 अदालतों में भारी केस लोड की हकीकत
जस्टिस अमानुल्लाह ने बताया कि अदालतों में जजों पर अत्यधिक कार्यभार है।
निचली अदालतों में एक जज के सामने प्रतिदिन औसतन 400 से 500 मामले सूचीबद्ध होते हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में यह संख्या और अधिक हो जाती है।
उन्होंने कहा कि अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि लंबित मामलों का कारण जजों की कार्यप्रणाली है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
🔹 “जज काम नहीं करते” धारणा भ्रामक
उन्होंने इस आरोप को खारिज किया कि न्यायाधीश पर्याप्त काम नहीं करते।
उनके अनुसार, जज निर्धारित समय तक नियमित रूप से बैठते हैं और मामलों की सुनवाई करते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कभी यह शिकायत होती है कि जज अदालत में नहीं बैठते? उनका जवाब था—ऐसी शिकायतें बहुत कम देखने को मिलती हैं।
🔹 हर तर्क सुनना न्यायाधीश का कर्तव्य
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीश का मूल कर्तव्य है कि वह सभी पक्षों को पूरा अवसर दे।
भले ही बहस लंबी या दोहरावपूर्ण लगे, जज उसे पूरी तरह सुनने के लिए बाध्य होता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जज किसी वकील को पूरी तरह रोक नहीं सकता, क्योंकि संभव है कि उसी बहस में कोई महत्वपूर्ण बिंदु सामने आ जाए।
🔹 सुनवाई की अवधि तय करते हैं वकील
उन्होंने एक अहम बिंदु उठाते हुए कहा कि मामलों के निपटान की गति काफी हद तक वकीलों पर निर्भर करती है।
- बहस कितनी लंबी चलेगी
- कितनी बार स्थगन लिया जाएगा
ये सभी कारक सुनवाई की अवधि को प्रभावित करते हैं।
इसलिए, न्यायिक देरी को केवल जजों की संख्या या उनकी क्षमता से जोड़ना उचित नहीं है।
🔹 निपटान दर और जजों का सीधा संबंध नहीं
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि मामलों के निपटान की दर और जजों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।
उन्होंने बताया कि अदालतों का कार्य समय सीमित होता है—आमतौर पर करीब पांच घंटे प्रतिदिन।
ऐसे में यह अपेक्षा करना कि सीमित समय में अधिकतम मामलों का निपटान हो, व्यावहारिक नहीं है।
🔹 विधि पेशे में आत्ममंथन की जरूरत
उन्होंने वकीलों से आत्मनिरीक्षण करने का आह्वान किया।
खास तौर पर:
- अनावश्यक लंबी बहस
- बार-बार स्थगन
जैसी प्रथाओं पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि न्यायिक सुधार केवल अदालतों के भीतर नहीं, बल्कि पूरे विधि तंत्र में बदलाव से संभव है।
🔹 “जज को जीनियस होने की जरूरत नहीं”
आईसीए के 5वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने एक अलग दृष्टिकोण भी रखा।
उन्होंने कहा कि न्यायाधीश से अत्यधिक बौद्धिक या विशेषज्ञ होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
उनके अनुसार, एक आदर्श जज की पहचान है:
- निष्पक्षता
- पारदर्शिता
- सभी पक्षों को सुनने की क्षमता
यदि जज पहले से ही किसी विषय में पूरी तरह निष्कर्ष पर पहुंचा होगा, तो बहस की गुंजाइश कम हो जाएगी।
🔹 संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत
जस्टिस अमानुल्लाह का यह बयान न्यायिक प्रणाली पर एक संतुलित नजरिया प्रस्तुत करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों की समस्या बहुआयामी है और इसका समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।
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