‘Sharbat Rooh Afza’ को यूपी VAT कानून के तहत “फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट” माना जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘Sharbat Rooh Afza’ को यूपी VAT कानून के तहत “फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट” माना जाएगा। इसलिए इस पर 12.5% नहीं बल्कि 4% VAT लगेगा। कोर्ट ने अतिरिक्त वसूले गए टैक्स की वापसी या समायोजन का आदेश दिया।
Supreme Court of India ने ‘शरबत रूह अफज़ा’ के टैक्स वर्गीकरण से जुड़े लंबे विवाद को सुलझाते हुए कहा है कि यह उत्पाद फ्रूट ड्रिंक / प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट की श्रेणी में आता है और इस पर 4% VAT ही लागू होगा।
न्यायमूर्ति BV Nagarathna और न्यायमूर्ति R Mahadevan की पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि उत्पाद को अवर्गीकृत (residuary) वस्तु मानकर 12.5% VAT लगाना कानून के अनुरूप नहीं था।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अधिक वसूला गया टैक्स रिफंड या समायोजन के रूप में कंपनी को लौटाया जाए।
मामला क्या था
मामला प्रसिद्ध पेय उत्पाद Sharbat Rooh Afza के टैक्स वर्गीकरण से जुड़ा था, जिसे Hamdard (Wakf) Laboratories बनाती है।
कंपनी ने आकलन अवधि 1 जनवरी 2008 से 31 मार्च 2012 के बीच इस उत्पाद को Uttar Pradesh Value Added Tax Act, 2008 के तहत “फ्रूट ड्रिंक” मानते हुए 4% VAT चुकाया था।
यह वर्गीकरण Schedule II, Part A की Entry 103 पर आधारित था, जिसमें प्रोसेस्ड या संरक्षित फल-सब्ज़ियां, जैम, जेली, अचार, फ्रूट स्क्वैश, फ्रूट जूस और फ्रूट ड्रिंक शामिल हैं।
हालांकि टैक्स अधिकारियों ने इसे “अवर्गीकृत वस्तु” मानते हुए Schedule V के तहत 12.5% VAT लगाने का आदेश दिया।
ट्रिब्यूनल और बाद में Allahabad High Court ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा। इसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट की कानूनी पड़ताल
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि फिस्कल कानून की व्याख्या उसके अपने शब्दों में ही की जानी चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुणवत्ता या लाइसेंसिंग से जुड़े नियम—जैसे Food Products Order, 1955—टैक्स वर्गीकरण को नियंत्रित नहीं करते, जब तक कि टैक्स कानून स्वयं उन्हें शामिल न करे।
अदालत ने कहा कि चूंकि UPVAT कानून में “फ्रूट ड्रिंक” की कोई परिभाषा नहीं है, इसलिए इसका अर्थ कॉमन पार्लेंस टेस्ट यानी आम व्यावसायिक और उपभोक्ता समझ के आधार पर तय किया जाएगा।
इस संदर्भ में कोर्ट ने कई पुराने फैसलों का हवाला दिया, जिनमें Ramavatar Budhaiprasad v Assistant STO, Indo International Industries v CST और CCE v Connaught Plaza Restaurant Pvt Ltd शामिल हैं।
इन फैसलों में सिद्धांत स्थापित किया गया है कि टैक्स वर्गीकरण में व्यापारिक समझ और उपभोक्ता धारणा को प्राथमिकता दी जाती है।
‘शरबत’ नाम से भ्रम नहीं
राजस्व विभाग ने मुख्य रूप से उत्पाद के नाम “शरबत” और लाइसेंसिंग मानकों पर भरोसा किया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विभाग यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सका कि बाजार या उपभोक्ता इसे फल-आधारित पेय नहीं मानते।
कोर्ट ने कहा कि विभाग ने कोई व्यापारिक सर्वे, उपभोक्ता अध्ययन या बाजार प्रमाण पेश नहीं किया।
‘Essential Character’ टेस्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर वर्गीकरण नहीं किया जा सकता कि उत्पाद में चीनी की मात्रा अधिक है।
अदालत के अनुसार, वर्गीकरण उस घटक के आधार पर होना चाहिए जो उत्पाद को उसका मूल पेय-स्वरूप (essential beverage character) देता है।
कोर्ट ने पाया कि रूह अफज़ा में लगभग 10% फलों का रस मौजूद है और यह एक फलों पर आधारित पेय तैयारी है, जिसे आमतौर पर पानी या दूध में मिलाकर पिया जाता है।
रेजिड्यूरी एंट्री का सीमित उपयोग
अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी वस्तु को residuary entry में तभी रखा जा सकता है जब उसे किसी विशेष प्रविष्टि में रखना संभव न हो।
इस संदर्भ में कोर्ट ने Dunlop India Ltd v Union of India का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी वस्तु को बिना वजह “residuary clause के अनाथालय” में नहीं भेजा जाना चाहिए।
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ‘Sharbat Rooh Afza’ को Schedule II की Entry 103 के तहत फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट माना जाएगा।
इसलिए संबंधित अवधि में इस पर 4% VAT ही लागू होगा।
कोर्ट ने 12.5% टैक्स लगाने वाले आदेशों को रद्द करते हुए अधिकारियों को अतिरिक्त वसूले गए टैक्स की वापसी या समायोजन का निर्देश दिया।
Case: Hamdard (Wakf) Laboratories v Commissioner Commercial Tax
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