‘सर तन से जुदा’ नारे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त — जुलूस के आरोपियों की एफआईआर रद्द करने की मांग खारिज

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🧑‍⚖️ ‘सर तन से जुदा’ नारे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त — जुलूस के आरोपियों की एफआईआर रद्द करने की मांग खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में “आई लव मोहम्मद” जुलूस के दौरान “सर तन से जुदा” नारा लगाने के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग खारिज की। अदालत ने कहा — “ऐसे अपराध कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं, जांच विधि अनुसार जारी रहेगी।”

लखनऊ | विधि संवाददाता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुए “आई लव मोहम्मद” पोस्टर विवाद के समर्थन में निकाले गए जुलूस के दौरान “सर तन से जुदा” जैसे भड़काऊ नारे लगाने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने की मांग ठुकरा दी है। अदालत ने कहा कि ऐसा नारा लगाना कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है और मामले की जांच जारी रहेगी।

न्यायमूर्ति अजय भनोट और गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सोमवार को आरोपियों गौहर खान और शाकिब जमाल की रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अदालत इस स्तर पर एफआईआर रद्द नहीं कर सकती क्योंकि जांच में हस्तक्षेप करना न्यायिक अनुशासन के खिलाफ होगा।


⚖️ मामला क्या है?

यह विवाद 26 सितंबर 2024 को बरेली में हुए एक हिंसक प्रदर्शन से जुड़ा है। शुक्रवार की नमाज के बाद कोतवाली क्षेत्र स्थित एक मस्जिद के बाहर करीब दो हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई। प्रदर्शनकारियों ने “आई लव मोहम्मद” पोस्टर विवाद पर प्रशासन द्वारा प्रदर्शन रद्द किए जाने का विरोध करते हुए जुलूस निकाला।

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, जुलूस के दौरान भीड़ ने पथराव किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए और आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने इस प्रदर्शन को कानपुर में हुए इसी प्रकार के विरोध का विस्तार बताया।

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एफआईआर में आरोप लगाया गया कि इस जुलूस के दौरान गौहर खान और शाकिब जमाल ने भीड़ को उकसाते हुए “सर तन से जुदा” के नारे लगाए।


⚖️ एफआईआर और कानूनी प्रावधान

इस मामले में कैंट थाने में भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) की कई धाराओं के तहत FIR एफआईआर दर्ज की गई। इनमें धारा 152 (सार्वजनिक शांति भंग करने का प्रयास), धारा 196 (उकसाने वाले वक्तव्य), धारा 299 (सामूहिक हिंसा) और धारा 353 (सरकारी कर्मचारी पर हमला) जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं।

आरोपियों ने अपनी रिट याचिका में कहा कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाए। साथ ही, उन्होंने पुलिस को किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से रोकने का भी अनुरोध किया था।


⚖️ हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद कहा कि यह मामला सार्वजनिक शांति और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में प्रारंभिक स्तर पर एफआईआर को रद्द करना न्याय के हित में नहीं होगा।

पीठ ने कहा —

“यदि किसी धार्मिक जुलूस या सभा के दौरान हिंसा या भड़काऊ नारे लगाए जाते हैं, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था की चुनौती है। अदालत को ऐसे मामलों में सावधानीपूर्वक हस्तक्षेप करना चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि “जांच एजेंसी को स्वतंत्र रूप से अपनी जांच पूरी करने दी जानी चाहिए और अदालत को इस चरण पर कोई राहत नहीं देनी चाहिए।”


⚖️ निचली अदालत में सुनवाई जारी रहेगी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपियों को जांच में सहयोग करना होगा और यदि पुलिस चार्जशीट दाखिल करती है, तो वे अपने अधिकारों का प्रयोग निचली अदालत में विधिक प्रक्रिया के तहत कर सकते हैं।

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पीठ ने कहा —

“मामले में दर्ज प्राथमिकी प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध को दर्शाती है। इसलिए इसे रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। जांच और आगे की कार्रवाई विधि अनुसार जारी रहेगी।”

इसके साथ ही अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया। अब यह मामला संबंधित निचली अदालत (Bareilly Trial Court) में आगे की सुनवाई के लिए भेजा गया है।


⚖️ कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अदालतों के उस दृष्टिकोण को दोहराता है कि भड़काऊ नारेबाजी और भीड़ हिंसा जैसे मामलों में एफआईआर रद्द करने का आदेश केवल “दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों” में ही दिया जा सकता है।


मामले का शीर्षक: Gauhar Khan & Shakib Jamal v. State of Uttar Pradesh


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