इलाहाबाद HC : 5 महीने की बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के केस में मौत की सज़ा उम्रकैद में बदली, अपराध सिद्ध—पर ‘rarest of rare’ नहीं

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5 महीने की बच्ची से दुष्कर्म व हत्या: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मौत की सज़ा को उम्रकैद (बिना remission) में बदला

इलाहाबाद हाई कोर्ट लखनऊ खंडपीठ ने 2020 के उस जघन्य केस में, जिसमें 5 महीने की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या का आरोप था, ट्रायल कोर्ट की मौत की सज़ा को उम्रकैद (natural life without remission) में बदल दिया। कोर्ट ने कहा—चूंकि मामला circumstantial evidence पर आधारित है, इसलिए मौत की सज़ा ‘rarest of rare’ मानदंड पर पूरी नहीं उतरती।


इलाहाबाद HC : 5 महीने की बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के केस में मौत की सज़ा उम्रकैद में बदली, अपराध सिद्ध—पर ‘rarest of rare’ नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 2020 के उस भीषण अपराध में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सज़ा को कम करते हुए उसे क़ैद-ए-उम्र (natural life without remission) में बदल दिया है, जिसमें 5 महीने की बच्ची से दुष्कर्म के बाद हत्या का मामला शामिल था।

यह फैसला एक मृत्युदंड संदर्भ (Capital Case) व convict की अपील पर सुनाया गया।

पीठ—

  • जस्टिस रजनीश कुमार
  • जस्टिस राजीव सिंह

ने कहा कि यद्यपि अपराध अत्यंत घिनौना है और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला दोष सिद्ध करती है, परंतु—

  • Probation Officer, Jail Administration, या Psychological Evaluation की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं,
  • convict का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं,
  • अपराध पूर्व-नियोजित (pre-meditated) प्रतीत नहीं होता,

—ऐसी स्थिति में death penalty देना उचित नहीं होगा।

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🔹 मामले की पृष्ठभूमि

फ़रवरी 2020 में:

  • शिकायतकर्ता की पत्नी व देवरानी बच्चों के साथ एक शादी में शामिल हुई थीं।
  • शाम को शिकायतकर्ता का भतीजा (convict) 5 महीने की बच्ची को “खेलाने” के बहाने लेकर गया।
  • बहुत समय बीत जाने पर खोजबीन शुरू हुई।
  • बच्ची एक झाड़ियों में अचेत अवस्था में मिली।
  • उसे ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

आरोप:

  • बच्ची को किडनैप,
  • दुष्कर्म,
  • और फिर हत्या की गई।

ट्रायल कोर्ट ने IPC 302, 364, 376(Ka)(Kha) और POCSO Section 6 में मौत की सज़ा सुनाई थी।


🔹 हाई कोर्ट की दलीलें और विश्लेषण

कोर्ट ने माना कि—

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला आरोपी की ओर ही संकेत करती है।
✔ बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया और फिर ऐसी हालत में छोड़ा गया कि उसकी मृत्यु हो गई।
✔ ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि संबंधी निर्णय सही है और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं

हालांकि, सज़ा के संदर्भ में कोर्ट ने कहा:

“Death penalty केवल उन मामलों में उचित है जहाँ यह बिल्कुल अनिवार्य हो। Circumstantial evidence वाले मामलों में आमतौर पर उम्रकैद बिना remission पर्याप्त होती है।”

कोर्ट ने aggravating और mitigating परिस्थितियों का संतुलन करते हुए कहा कि:

  • आरोपी 27 वर्ष का था,
  • उसका भी एक 3–4 वर्ष का बच्चा है,
  • कोई पूर्व अपराध नहीं,
  • pre-meditation का प्रमाण नहीं,
  • सज़ा कम करते समय सामाजिक संरक्षण और न्याय दोनों संतुलित रखना ज़रूरी है।
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🔹 फैसला

  • दोषसिद्धि कायम
    (IPC 302, 364, 376(Ka)(Kha) और POCSO 6)
  • धारा 364 IPC की सज़ा ज्यों की त्यों बरकरार
  • मौत की सज़ा बदली

    उम्रकैद—natural life imprisonment without remission

Case Title:

Prem Chand @ Pappu Dixit v. State of U.P. & Another


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