न्यायिक गरिमा बनाम पुलिस शक्ति: 1991 का ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट मामला
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की सुनवाई के वीडियो आज सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1991 में पुलिस द्वारा एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को हथकड़ी पहनाने की घटना ने न्यायिक स्वतंत्रता पर बड़ा संवैधानिक फैसला दिया था? जानिए Delhi Judicial Service Association बनाम गुजरात सरकार मामला।
सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाई कोर्ट की सुनवाई आज रिकॉर्ड होती हैं और अक्सर उनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो जाते हैं। इन रिकॉर्डिंग्स में कई बार देखा जाता है कि न्यायाधीश पुलिस अधिकारियों को उनके कार्य में लापरवाही या कानून के उल्लंघन पर सख्त फटकार लगाते हैं। लेकिन भारतीय न्यायिक इतिहास में एक ऐसा भी दौर रहा है, जब पुलिस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हुए एक न्यायिक अधिकारी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की हद पार कर दी थी।
यह घटना न केवल एक व्यक्ति से जुड़ी थी, बल्कि उसने पूरे न्याय तंत्र की स्वतंत्रता, गरिमा और सम्मान को कठघरे में खड़ा कर दिया। विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज (टेक्निकल कैंपस), दिल्ली में विधि की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमिता ने बातचीत में इसी ऐतिहासिक मामले का ज़िक्र किया, जिसने सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने के लिए मजबूर किया।
क्या था पूरा मामला?
डॉ. अमिता के अनुसार, यह मामला पहली बार 1991 में सुप्रीम कोर्ट के सामने आया और इसे Delhi Judicial Service Association बनाम गुजरात सरकार के नाम से जाना जाता है। इस केस की जड़ें गुजरात के नडियाद शहर से जुड़ी हैं, जहां उस समय श्री एन.एल. पटेल मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate – CJM) के पद पर तैनात थे।
CJM पटेल ने पाया कि स्थानीय पुलिस अदालत द्वारा जारी समन, वारंट और नोटिसों का समय पर पालन नहीं कर रही थी। इसका सीधा असर ट्रायल और न्यायिक कार्यवाही पर पड़ रहा था। उन्होंने इस लापरवाही की शिकायत कई बार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से की, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे पुलिस और न्यायिक अधिकारी के बीच तनाव बढ़ने लगा।
पुलिस स्टेशन बुलाकर अपमान का आरोप
तनाव के इसी माहौल में 25 दिसंबर 1989 को नडियाद के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एस.आर. शर्मा ने कथित तौर पर मतभेद सुलझाने के बहाने Chief Judicial Magistrate पटेल को पुलिस स्टेशन बुलाया। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।
CJM एन.एल. पटेल का आरोप था कि पुलिस स्टेशन में उन्हें जबरन शराब पिलाने की कोशिश की गई। विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई, हथकड़ी पहनाई गई और मोटी रस्सी से बांधकर अस्पताल ले जाया गया। यही नहीं, अस्पताल में प्रेस फोटोग्राफरों को बुलाकर उनकी हथकड़ी लगी तस्वीरें खिंचवाई गईं, जिन्हें अगले दिन अखबारों में प्रकाशित कराया गया।
उनका कहना था कि यह सब उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और न्यायपालिका को डराने के उद्देश्य से किया गया।
पुलिस का बचाव और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
वहीं पुलिस का दावा था कि CJM स्वयं नशे की हालत में पुलिस स्टेशन पहुंचे थे और उन्होंने अपनी मर्जी से हथकड़ी लगवाकर तस्वीरें खिंचवाईं। हालांकि, यह तर्क न तो सुप्रीम कोर्ट को स्वीकार्य हुआ और न ही देश के विधि विशेषज्ञों को।
इस घटना के बाद देशभर में न्यायिक अधिकारियों, बार एसोसिएशनों और वकीलों ने तीव्र विरोध प्रदर्शन किए। इसे न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा हमला बताया गया। इसके बाद दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं-
- किसी भी न्यायिक अधिकारी का इस तरह अपमान करना पूरे न्याय तंत्र को कमजोर करता है।
- पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, न कि न्यायपालिका को अपमानित करने का।
- न्यायिक स्वतंत्रता और गरिमा लोकतंत्र की रीढ़ है, जिसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जा सकता।
इसी फैसले के आधार पर आगे चलकर न्यायिक अधिकारियों की गिरफ्तारी, उनके साथ व्यवहार और सम्मान को लेकर दिशा-निर्देशों की नींव रखी गई, जो आज भी न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
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