इलाहाबाद हाईकोर्ट: IPC की धारा 420 और 406 में एकसाथ नहीं चल सकती आपराधिक कार्यवाही, गाजीपुर केस में समन आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 406 (आपराधिक न्यास भंग) के तहत एकसाथ आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। कोर्ट ने गाजीपुर के आतिफ रजा उर्फ शरजील रजा समेत तीन आरोपियों के खिलाफ जारी समन आदेश को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया।


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 और धारा 406 के तहत एकसाथ आपराधिक कार्यवाही नहीं चल सकती। न्यायालय ने इसी आधार पर गाजीपुर के दबंग बताए जा रहे आतिफ रजा उर्फ शरजील रजा और दो अन्य आरोपियों के खिलाफ सीजेएम, गाजीपुर द्वारा चार्जशीट पर संज्ञान लेकर जारी किए गए समन आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति पी.के. गिरि ने पारित किया। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के कानून के अनुरूप 30 दिनों के भीतर नए सिरे से संज्ञान आदेश पारित करें।

क्या है पूरा मामला?

याची आतिफ रजा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र उपाध्याय ने कोर्ट को बताया कि सैयद बाड़ा निवासी महमूद आलम ने कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसकी, रवींद्र नारायण सिंह और बैस खान की मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शन नामक एक साझेदारी फर्म थी।

आरोप के अनुसार, याची ने स्वयं को फर्म में शामिल करने का दबाव बनाया और इनकार करने पर जान से मारने की धमकी दी। भयवश शिकायतकर्ता और उसके साथियों ने याची को फर्म में भागीदार बना लिया। इसके बाद फर्म के खाते में जमा शिकायतकर्ता के करीब 76 लाख रुपये समेत अन्य भागीदारों के करोड़ों रुपये याची द्वारा हड़प लेने का आरोप लगाया गया।

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शिकायतकर्ता के बेटे की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उसने कथित घोटाले और धोखाधड़ी के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और मजिस्ट्रेट ने धारा 420 व 406 के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया।

कानूनी बहस और सुप्रीम कोर्ट का हवाला

याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि IPC की धारा 420 और 406 एकसाथ लागू नहीं की जा सकतीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली रेस क्लब मामले का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि इन दोनों धाराओं के अंतर्गत एक साथ आपराधिक कार्यवाही चलाना विधिसम्मत नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए समन आदेश को रद्द कर दिया और मजिस्ट्रेट को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पुनः विचार कर आदेश पारित करने का निर्देश दिया।


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