सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक केस में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि सिविल विवादों को आपराधिक मुकदमों में बदलना न्यायपालिका पर बोझ डालता है। पुलिस और ट्रायल कोर्ट को चार्जशीट दाखिल करने व चार्ज तय करने में अधिक सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए। कोर्ट ने पाया कि FIR में IPC की धाराओं 354C, 341 और 506 के आवश्यक तत्व नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा: सिविल विवाद को आपराधिक केस में न बदलें; मजबूत सबूत के अभाव में आरोपी discharged
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस और ट्रायल कोर्ट को चार्जशीट दाखिल करने और चार्ज फ्रेम करते समय सावधान रहना चाहिए, ताकि केवल वे ही मामले ट्रायल में जाएँ जिनमें सशक्त, कानूनी रूप से टिकाऊ ‘strong suspicion’ हो। केवल आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना नागरिकों के निष्पक्ष न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।
निर्णय न्यायमूर्ति एन.के. सिंह और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने दिया, जिसने आरोपी-अपीलकर्ता को आपराधिक कार्यवाही से मुक्त कर दिया।
🔹 मामले की पृष्ठभूमि
FIR में आरोप था कि:
- शिकायतकर्ता, जो स्वयं को किरायेदार बताती थी, 18 मार्च 2020 को संपत्ति में प्रवेश करना चाहती थी,
- आरोपी (सह-मालिक का बेटा) ने कथित रूप से उन्हें रोक दिया,
- फोटो/वीडियो क्लिक किए,
- जिससे कथित तौर पर उसकी “मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना” हुई।
पुलिस ने IPC की धारा 341 (wrongful restraint), 354C (voyeurism), 506 (criminal intimidation) के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी।
जबकि इस बीच:
- संपत्ति को लेकर सिविल मुकदमा लंबित था,
- और अदालत ने पहले से ही एक निषेधाज्ञा (injunction) जारी कर रखी थी जिसे शिकायतकर्ता तोड़कर प्रवेश करना चाहती थी।
🔹 सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
1️⃣ धारा 354C IPC (Voyeurism) – FIR में ‘private act’ का कोई आरोप नहीं
Bench ने कहा:
- Voyeurism तभी बनता है जब महिला ‘private act’ में हो।
- FIR और चार्जशीट में ऐसी कोई भी बात नहीं थी कि शिकायतकर्ता किसी निजी गतिविधि में संलग्न थी।
- इसलिए इस धारा में अपराध बनता ही नहीं।
2️⃣ धारा 506 IPC (Criminal Intimidation) – धमकी के तत्व अनुपस्थित
- FIR में केवल “intimidation” का निराधार आरोप लगाया गया था,
- पर कोई शब्द, कथन या ऐसा व्यवहार नहीं बताया गया जिससे “injury to person or property” साबित हो सके।
- FIR में कोई विस्तृत विवरण नहीं, न ही कोई बयान।
→ इसलिए धारा 506 भी आकर्षित नहीं होती।
3️⃣ धारा 341 IPC (Wrongful Restraint) – शिकायतकर्ता का प्रवेश ही अवैध था
- जिस दिन घटना बताई गई, उस दिन शिकायतकर्ता का संपत्ति में प्रवेश निषेधाज्ञा का उल्लंघन होता।
- आरोपी ने वही रोका, जिसे वह अपना वैध अधिकार समझता था।
कोर्ट ने कहा:
“यह अधिकतम सिविल मुकदमे का विषय है—न कि आपराधिक। इसे आपराधिक मामला बनाना कानून का दुरुपयोग है।”
🔹 पुलिस और न्यायालयों को कड़ी चेतावनी
पीठ ने गहरी चिंता जताई:
“मजबूत संदेह के बिना चार्जशीट दाखिल करने की प्रवृत्ति न्यायिक व्यवस्था को जाम कर देती है—न्यायाधीशों, अदालत के कर्मचारियों और अभियोजकों का समय ऐसे मामलों में लगता है जिनका परिणाम अंततः बरी होने में होता है।”
और आगे कहा:
“राज्य नागरिकों पर मुकदमा तब तक न चलाए जब तक दोष सिद्धि की यथोचित संभावना न हो—यह निष्पक्ष प्रक्रिया का मूल सिद्धांत है।”
🔹 निष्कर्ष: आरोपी को पूरी तरह Discharge
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
- मामला पूरी तरह सिविल प्रकृति का,
- FIR में कोई मजबूत, कानूनी रूप से टिकाऊ ‘strong suspicion’ नहीं,
- और शिकायतकर्ता द्वारा कोई भी न्यायिक बयान नहीं दिया गया।
इस आधार पर अपील मंजूर करते हुए आरोपी को पूर्णत: discharge कर दिया गया।
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