सुप्रीम कोर्ट में असामान्य घटना: वकील ने आत्महत्या की धमकी दी, कोर्ट ने माफीनामा दाखिल करने का आदेश दिया

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सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक अप्रत्याशित घटना घटी, जब एक वकील ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के दौरान धमकी दी कि यदि उसकी आपराधिक याचिका स्वीकार नहीं की गई तो वह आत्महत्या कर लेगा।

मामला और न्यायालय की प्रतिक्रिया

न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ के समक्ष रमेश कुमारन और अन्य बनाम पुलिस निरीक्षक और अन्य नामक याचिका पर सुनवाई हो रही थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एवं बार के सदस्य रमेश कुमारन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए और कहा कि यदि प्रतिवादी संख्या दो के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी जाती है तो वह आत्महत्या कर लेंगे

इस अप्रत्याशित बयान से न्यायालय पहले कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया, लेकिन फिर अदालत ने कुमारन को बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया।

न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

न्यायमूर्ति ओका ने वकील की इस धमकी को अनुचित ठहराते हुए कड़ी टिप्पणी की:
“आप अदालत को कैसे धमकी दे सकते हैं कि यदि हम आपकी प्रार्थना स्वीकार नहीं करेंगे तो आप आत्महत्या कर लेंगे? आप एक वकील हैं। हम बार काउंसिल से आपका लाइसेंस निलंबित करने और आपके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए कह सकते हैं।”

इस टिप्पणी के बाद वकील ने कथित तौर पर अपना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक बंद कर दिया। हालांकि, कुछ देर बाद वह पुनः वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए और कहा, “मैं दिल से माफी मांगता हूं। मैं भावनात्मक रूप से अस्थिर हो गया था।”

कोर्ट ने लिखित माफीनामा मांगा

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अदालत ने मौखिक माफी स्वीकार करने से इनकार करते हुए निर्देश दिया कि वकील को सात (7) मार्च तक लिखित माफीनामा दाखिल करना होगा, अन्यथा उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई सात मार्च को निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

रमेश कुमारन ने एक आपराधिक मामले में अदालत का रुख किया था, जिसमें राघवेंद्रन नामक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस एफआईआर दर्ज की गई थी।

निष्कर्ष

इस घटना से स्पष्ट होता है कि न्यायालय की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है और वकीलों को अनुशासन एवं पेशेवर नैतिकता का पालन करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया से यह संदेश जाता है कि भावनात्मक आवेश में न्यायालय को प्रभावित करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है और ऐसे कृत्यों पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

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