सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: “कश्मीर में पत्थरबाजी कोई मामूली हरकत नहीं” — शब्बीर शाह को हिरासत आदेश के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से संपर्क करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी कोई साधारण हरकत नहीं है।” कोर्ट ने अलगाववादी नेता शब्बीर शाह को हिरासत आदेश की प्रति पाने के लिए राज्य सरकार से संपर्क करने का निर्देश दिया। NIA को तीन हफ्तों में जवाब दाखिल करने का समय दिया गया।

📰 सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: “कश्मीर में पत्थरबाजी कोई मामूली हरकत नहीं” — शब्बीर शाह को हिरासत आदेश के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से संपर्क करने का निर्देश

नई दिल्ली | विधि संवाददाता: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कश्मीर के अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि “जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी कोई सामान्य या साधारण घटना नहीं है।” कोर्ट ने शाह को सलाह दी कि वे अपने हिरासत आदेश की प्रति प्राप्त करने के लिए जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस (National Confrence) सरकार से संपर्क करें, न कि जमानत याचिका में ऐसे दस्तावेजों की मांग करें।


⚖️ तीन हफ्तों में NIA से जवाब मांगा

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को शाह के नये हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया कि शाह के नये हलफनामे में कुछ नये तथ्य जोड़े गए हैं जो उनके पाकिस्तान-आधारित आतंकी नेटवर्क से संबंध दर्शाते हैं।

शाह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने कहा कि उनके मुवक्किल के परिवार को अब तक 1970 से जारी हिरासत आदेशों की प्रतियां नहीं दी गईं। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की —

“आप सरकार से जानकारी मांगिए, जमानत कार्यवाही में नहीं। यह मामला 50 साल पुराना है।”


⚖️ “पत्थरबाजी कोई साधारण अपराध नहीं”

जब गोंसाल्विस ने कहा कि शाह को 39 वर्षों से केवल भाषणों और उसके बाद हुई पत्थरबाजी के आरोपों पर जेल में रखा गया है, तब न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा —

“कश्मीर में पत्थरबाजी कोई बहुत साधारण हरकत नहीं है।”


⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी राहत से किया था इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले शाह को आतंकी फंडिंग केस में अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया था।
हालांकि, कोर्ट ने उनकी याचिका पर NIA से दो हफ्तों में जवाब मांगा था, जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के 12 जून 2024 के आदेश को चुनौती दी थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि शाह की रिहाई से गवाहों को प्रभावित करने या अवैध गतिविधियों को दोहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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⚖️ केस का पृष्ठभूमि: 2017 की NIA जांच

NIA ने 2017 में 12 व्यक्तियों के खिलाफ केस दर्ज किया था, जिसमें षड्यंत्र, पत्थरबाजी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश के आरोप शामिल थे।
शाह पर आरोप है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को फंडिंग और उकसावे से बढ़ावा दिया।

चार्जशीट में आरोप था कि उन्होंने:

  • भारत-विरोधी नारेबाजी और रैलियों में लोगों को उकसाया।
  • आतंकियों के परिवारों की सार्वजनिक प्रशंसा की।
  • हवाला और एलओसी ट्रेड के जरिए पैसा जुटाया, जो उग्रवाद फैलाने में उपयोग हुआ।

⚖️ “अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमाएं” — दिल्ली हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है —

“यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अपराध के उकसावे के अधीन है। कोई भी व्यक्ति इस अधिकार का दुरुपयोग देश की अखंडता के खिलाफ भड़काऊ भाषण देकर नहीं कर सकता।”

हाईकोर्ट ने शाह की घर में नजरबंदी (House Arrest) की वैकल्पिक मांग भी अस्वीकार कर दी थी, यह कहते हुए कि उन पर लगे आरोप अत्यंत गंभीर हैं और वे प्रतिबंधित संगठन “जम्मू एंड कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी (JKDFP)” के अध्यक्ष हैं।


⚖️ 24 मामलों में लंबित आरोप

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया था कि शाह के खिलाफ 24 से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें अधिकतर कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश या राज्य की शांति भंग करने से संबंधित हैं।


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