रजिस्टर्ड वसीयत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रामाणिकता की धारणा, चुनौती देने वाले पर सबूत का भार

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Supreme Court’s big decision on registered will: Presumption of authenticity, burden of proof on challenger

रजिस्टर्ड वसीयत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रामाणिकता की धारणा, चुनौती देने वाले पर सबूत का भार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में दोहराया कि रजिस्टर्ड वसीयत (Registered Will) के उचित निष्पादन और प्रामाणिकता की धारणा (Presumption of Validity) होती है और इसकी वैधता को चुनौती देने वाले पक्ष पर सबूत पेश करने का दायित्व होता है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए निचली अदालत का फैसला बहाल कर दिया। विवादित भूमि पर अपीलकर्ता लसुम बाई के पूर्ण स्वामित्व (Absolute Ownership) को मान्यता दी गई।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • वसीयत (दिनांक 24 जुलाई, 1974) रजिस्टर्ड दस्तावेज थी, इसलिए उसकी प्रामाणिकता पर संदेह का कोई ठोस आधार नहीं था।
  • प्रतिवादी (मुथैया) ने स्वीकार किया कि वसीयत पर उनके पिता एम. राजन्ना के हस्ताक्षर हैं और लसुम बाई के हिस्से की भूमि भी सही है।
  • मौखिक पारिवारिक समझौते (Oral Family Settlement) और वसीयत दोनों में संपत्ति का वितरण लगभग समान अनुपात में किया गया।
  • इस प्रकार, निचली अदालत का यह निष्कर्ष सही था कि संपत्ति का वैध और न्यायोचित वितरण किया गया था।

नतीजा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्टर्ड वसीयत की प्रामाणिकता मानी जाती है और उसके विरुद्ध दावा करने वाले पर ही यह साबित करने का बोझ होगा कि वसीयत अवैध है या संदिग्ध परिस्थितियों में बनी।

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फैसले के साथ ही निचली अदालत का आदेश बहाल कर दिया गया, जिससे अपीलकर्ता लसुम बाई को विवादित भूमि की पूर्ण स्वामिनी घोषित कर दिया गया।

Case Title: Metpalli Lasum Bai (Since Dead) and Others v. Metapalli Muthaih (D) by LRs

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