सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: हस्तांतरणी के सीमित अधिकार आदेश निष्पादन में बाधक नहीं

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: हस्तांतरणी के सीमित अधिकार आदेश निष्पादन में बाधक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि लंबित वाद के दौरान स्थानांतरित किए गए संपत्ति धारकों (transferee pendent lite) के सीमित अधिकारों को इस हद तक विस्तारित नहीं किया जा सकता कि वे आदेश प्राप्तकर्ताओं (decree holders) के पक्ष में आदेश निष्पादन में बाधा डालें।

मामले की पृष्ठभूमि

मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा अपीलकर्ता की पुनरीक्षण याचिका (revision petition) को खारिज किए जाने के निर्णय के विरुद्ध यह अपील सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई थी।

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने टिप्पणी की, “उच्च न्यायालय ने सही रूप में यह निष्कर्ष दिया कि न्यायालयों ने निरंतर यह माना है कि लंबित वाद के दौरान स्थानांतरण की स्थिति में स्थानांतरणी के अधिकार सीमित होते हैं। ऐसे सीमित अधिकारों का विस्तार आदेश निष्पादन में बाधा डालने के लिए नहीं किया जा सकता। वास्तव में, न्यायालयों ने ऐसी बाधाओं की निंदा की है।”

वाद के तथ्य

मामले में, उत्तरदाताओं के पिता चेनमौगम अरुमुगम ने ‘ए’ अनुसूची संपत्ति का आधा हिस्सा खरीदा था। 1977 में, उन्होंने ‘बी’ अनुसूची संपत्ति खरीदी और अपीलकर्ता के पक्ष में बिक्री समझौता निष्पादित किया। हालांकि, ₹20,000 की शेष राशि का भुगतान नहीं किया गया और अपीलकर्ता को ‘बी’ अनुसूची संपत्ति का कब्ज़ा दे दिया गया।

उत्तरदाताओं के पिता के निधन के पश्चात, पहले आठ उत्तरदाताओं ने नौवें उत्तरदाता और अपीलकर्ता के विरुद्ध मुकदमा दायर किया, जिसमें उनके पिता द्वारा नौवें उत्तरदाता के पक्ष में निष्पादित दो वसीयतों को अमान्य और अप्रभावी घोषित करने की मांग की गई थी।

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मुख्य अधीनस्थ न्यायाधीश (Principal Subordinate Judge) ने उत्तरदाता 1 से 8 के पक्ष में आदेश पारित किया और उन्हें ‘ए’ अनुसूची संपत्ति के 7/8वें हिस्से का स्वामी तथा ‘बी’ अनुसूची संपत्ति का संपूर्ण स्वामी घोषित किया।

बाद में, निष्पादन न्यायालय (Executing Court) ने आदेश के निष्पादन हेतु आवेदन स्वीकार किया और अपीलकर्ता को ‘बी’ अनुसूची संपत्ति का कब्ज़ा छोड़ने के लिए निर्देशित किया।

मद्रास उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा कि चूंकि अपीलीय न्यायालय ने आदेश में संशोधन किया था, इसलिए ‘विलयन सिद्धांत’ (Doctrine of Merger) लागू होता है, और तत्काल निष्पादन का प्रश्न नहीं उठता। इसके विरुद्ध अपीलकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस दृष्टिकोण को सही ठहराया कि चाहे आदेश में संशोधन हुआ हो या नहीं, एक बार जब अपीलीय न्यायालय द्वारा आदेश पारित कर दिया जाता है, तो निचली अदालत का आदेश एवं निर्णय उसी में विलीन हो जाता है।

अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि अपीलकर्ता की “अनुचित देरी” (inordinate delay) संबंधी दलील तर्कसंगत नहीं थी।

इसके अतिरिक्त, ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 53ए की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए न्यायालय ने कहा कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ता (revision petitioner) को यह ज्ञात था कि संपत्ति संबंधी मुकदमा लंबित था, इसके बावजूद उसने उत्तरदाता 1 से 8 के पिता के साथ समझौता किया। ऐसे में, उसे मूल हस्तांतरणकर्ता से अधिक या वैध अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते।

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इसके समर्थन में पीठ ने चांदी प्रसाद बनाम जगदीश प्रसाद (2004) मामले का उल्लेख किया, जिसमें यह स्थापित किया गया था कि किसी आदेश का विलयन (merger) अपीलीय न्यायालय के आदेश में संशोधन, पुष्टि या अस्वीकृति के बावजूद होता है।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि अपील में कोई ठोस आधार नहीं है और इसे खारिज कर दिया।

वाद शीर्षक – राजू नायडू बनाम चेनमौग सुंद्रा एवं अन्य

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