OBC क्रीमी लेयर: शादीशुदा महिला की आय किसकी मानी जाए? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

विवाहित OBC महिला की ‘क्रीमी लेयर’ उसके पति की आय से तय होगी या माता-पिता की आय से?

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल पर सुनवाई शुरू की—क्या सरकारी नौकरी में आरक्षण के लिए विवाहित OBC महिला की ‘क्रीमी लेयर’ उसके पति की आय से तय होगी या माता-पिता की आय से? कर्नाटक सिविल जज भर्ती से जुड़ा मामला 6 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध।


सरकारी नौकरी में OBC आरक्षण की पात्रता तय करने के मानदंड पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम संवैधानिक प्रश्न की जांच करने पर सहमति दी है। सवाल यह है कि किसी विवाहित OBC महिला उम्मीदवार की ‘क्रीमी लेयर’ स्थिति का निर्धारण उसके पति की आय के आधार पर होगा या उसके माता-पिता की आय के आधार पर?

मामला कर्नाटक की एक महिला से जुड़ा है, जिसने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए आवेदन किया था।

पृष्ठभूमि: II-A श्रेणी और विवाद

अपीलकर्ता हिंदू नामधारी समुदाय से संबंधित है, जो कर्नाटक में OBC की II-A श्रेणी में शामिल है। अप्रैल 2018 में उसकी शादी हुई। उसके पति OBC की III-B श्रेणी से संबंधित हैं। विवाह के बाद वह अपने माता-पिता से अलग रह रही है।

सिविल जज भर्ती में कुल 57 पदों में से 6 पद II-A श्रेणी के लिए आरक्षित थे। चयन प्रक्रिया में सफल होने के बाद महिला ने अपने पति की आय के आधार पर जाति और आय प्रमाणपत्र के सत्यापन तथा ‘नॉन-क्रीमी लेयर’ प्रमाणपत्र जारी करने का अनुरोध किया।

जिला समिति का फैसला

जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। समिति का कहना था कि महिला अपने माता-पिता की आय के कारण ‘क्रीमी लेयर’ में आती है और इस कारण वह आरक्षण की पात्र नहीं है।

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रिकॉर्ड के अनुसार, महिला की मां कर्नाटक न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हैं और पिता सहायक वन संरक्षक के पद से रिटायर हुए हैं। समिति ने माता-पिता की पेंशन और आय को ध्यान में रखते हुए उसे क्रीमी लेयर की श्रेणी में रखा।

कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख

महिला ने इस निर्णय को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क था कि विवाह के बाद उसकी सामाजिक और आर्थिक इकाई बदल चुकी है, इसलिए उसकी पात्रता उसके पति की आय के आधार पर तय होनी चाहिए। उसने कहा कि उसके पति की आय क्रीमी लेयर की सीमा से नीचे है, इसलिए उसे OBC आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

हालांकि, राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि क्रीमी लेयर निर्धारण में माता-पिता की पेंशन और आय को भी शामिल किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष को स्वीकार करते हुए कहा कि माता-पिता की पेंशन ‘आय’ का हिस्सा है और उसी के आधार पर पात्रता तय होगी। परिणामस्वरूप, महिला का दावा खारिज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठे प्रश्न

अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है, जहां दो प्रमुख कानूनी प्रश्नों पर विचार होगा:

  1. क्या विवाहित OBC महिला की क्रीमी लेयर स्थिति का निर्धारण पति की आय से किया जाना चाहिए या माता-पिता की आय से?
  2. यदि माता-पिता की आय को आधार माना जाए, तो क्या उनकी पेंशन को ‘आय’ की परिभाषा में शामिल किया जा सकता है?

ये प्रश्न न केवल व्यक्तिगत पात्रता से जुड़े हैं, बल्कि OBC आरक्षण नीति की व्याख्या और लैंगिक समानता के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।

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सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपील पर कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद अपीलकर्ता को एक सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

व्यापक प्रभाव

यह मामला देशभर में OBC आरक्षण से जुड़ी नीतियों पर असर डाल सकता है। विशेष रूप से, यह स्पष्ट कर सकता है कि विवाह के बाद महिला उम्मीदवार की सामाजिक-आर्थिक पहचान किस प्रकार निर्धारित की जाएगी और क्रीमी लेयर का आकलन किस आधार पर किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का आगामी निर्णय OBC आरक्षण व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।


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