Maneka Gandhi की टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा—यह अवमाननापूर्ण हैं, लेकिन हम संयम बरत रहे हैं
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर स्वतः संज्ञान मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की टिप्पणियों को अवमाननापूर्ण बताते हुए कहा कि अदालत अपनी उदारता के चलते आपराधिक अवमानना की कार्यवाही नहीं कर रही है।
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट |
आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों को लेकर चल रहे सुओ मोटो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की टिप्पणियों पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि गांधी द्वारा शीर्ष अदालत के आदेशों के खिलाफ की गई टिप्पणियां “अवमाननापूर्ण (contemptuous)” हैं, हालांकि कोर्ट अपनी उदारता (magnanimity) के कारण आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रही है।
“आपकी मुवक्किल किसी पर भी, कुछ भी कह रही हैं”
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन. वी. अंजारिया की पीठ ने मेनका गांधी की ओर से पेश वकील से कहा कि उनकी मुवक्किल अपने पॉडकास्ट में अदालत और अन्य संस्थाओं पर जिस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं, वह बेहद आपत्तिजनक हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा:
“क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उनकी बॉडी लैंग्वेज क्या है? वह क्या कहती हैं और कैसे कहती हैं? आप अदालत से संयम बरतने को कह रहे हैं, जबकि आपकी मुवक्किल किसी पर भी और किसी भी विषय पर टिप्पणी कर रही हैं।”
अवमानना बनती है, पर कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गांधी की टिप्पणियां अवमानना के दायरे में आती हैं, लेकिन अदालत जानबूझकर इस पर आपराधिक संज्ञान नहीं ले रही है।
पीठ ने कहा:
“आप कह रहे थे कि अदालत को सतर्क रहना चाहिए। क्या आपने देखा कि आपकी मुवक्किल किस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं? आपकी मुवक्किल ने अवमानना की है। हम इस पर संज्ञान नहीं ले रहे—यही हमारी उदारता है।”
रैबीज नियंत्रण पर मेनका गांधी की दलील
सुनवाई के दौरान मेनका गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने आवारा कुत्तों से फैलने वाले रेबीज और अन्य बीमारियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के तहत एक व्यापक रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम लागू किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में—
- एंटी-रेबीज वैक्सीन और सीरम की उपलब्धता
- पेशेवर क्षमता निर्माण
- पशु-काटने की घटनाओं का बेहतर प्रबंधन
- उच्च जोखिम समूहों के लिए प्री-एक्सपोज़र प्रोफाइलेक्सिस
- निगरानी और अनुसंधान को बढ़ावा
जैसे कदम शामिल होने चाहिए।
“कुत्तों को ही प्रमाणपत्र टांगने को कह दीजिए” — कोर्ट की व्यंग्यात्मक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कई शहरों में कुत्तों की नसबंदी (sterilisation) को लेकर पारदर्शिता की भारी कमी है। उन्होंने सुझाव दिया कि—
- नागरिकों को वेबसाइट पर अवांछित/अनसबंदी कुत्तों की शिकायत दर्ज करने की सुविधा दी जाए
- जिम्मेदार अधिकारियों को शिकायतों पर कार्रवाई के लिए नामित किया जाए
- संदेह होने पर अल्ट्रासाउंड टेस्ट से पुष्टि की जाए
इस पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा:
“क्यों न कुत्तों से ही कहा जाए कि वे अपना नसबंदी प्रमाणपत्र साथ रखें?”
फीडर्स पर टिप्पणी गंभीर थी, मज़ाक नहीं
भूषण ने आगाह किया कि अदालत की मौखिक टिप्पणियों के कभी-कभी अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पहले कोर्ट ने यह कहा था कि डॉग फीडर्स को कुत्तों के काटने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए, जो शायद व्यंग्यात्मक था।
हालांकि, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा:
“नहीं, हमने यह टिप्पणी व्यंग्य में नहीं की थी। हमने यह बहुत गंभीरता से कहा था।”
आगे की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- वर्तमान में सभी आवेदकों की दलीलें सुनी जा रही हैं
- अगली तारीख पर केंद्र सरकार और विभिन्न राज्यों की ओर से दलीलें सुनी जाएंगी
आवारा कुत्तों का मुद्दा देशभर में बढ़ती चिंता का विषय बन चुका है और सुप्रीम कोर्ट इस पर निगरानी में सुनवाई जारी रखे हुए है।
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