सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। मामला संसदीय जांच समिति की वैधता और जजेज इन्क्वायरी एक्ट, 1968 की व्याख्या से जुड़ा है। जस्टिस वर्मा को 12 जनवरी को समिति के समक्ष उपस्थित होना है।
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर बृहस्पतिवार को फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ ने जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा, तथा संसद के दोनों सदनों की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा। अदालत ने सभी पक्षों को सोमवार तक लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
समय सीमा बढ़ाने से इनकार
सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा के वकीलों ने लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच समिति के समक्ष पेश होने की समय सीमा बढ़ाने की मांग की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। जस्टिस वर्मा को 12 जनवरी को समिति के समक्ष उपस्थित होना है।
जजेज इन्क्वायरी एक्ट, 1968 पर विवाद
रोहतगी और लूथरा ने दलील दी कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को ही किसी न्यायाधीश को हटाने से जुड़े प्रस्ताव को स्वीकार करने का अधिकार है। उनके अनुसार, समिति के गठन की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है।
इसके विपरीत, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समिति के गठन का समर्थन करते हुए कहा कि यदि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार हो जाता है, तो जांच समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति संयुक्त रूप से करते हैं।
7 जनवरी के आदेश का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने 7 जनवरी को यह स्पष्ट किया था कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित करने से न्यायाधीश जांच अधिनियम के तहत कोई रोक नहीं है। हालांकि, इसी विषय से जुड़ा एक प्रस्ताव राज्यसभा में खारिज कर दिया गया था।
नोटों की बरामदगी और स्थानांतरण
गौरतलब है कि 14 मार्च को नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया था।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को जस्टिस वर्मा की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और संसद के दोनों सदनों के महासचिवों को नोटिस जारी किए थे।
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