सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा न्यायिक अधिकारी पर की गई टिप्पणियाँ हटाईं, न्यायिक निर्णयों में ‘कटाक्ष’ से संयम बरतने की नसीहत
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध की गई कठोर टिप्पणियाँ हटाते हुए यह दोहराया कि हाईकोर्ट को न्यायिक कार्य करते समय अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों पर टीका-टिप्पणी करने से सामान्यतः बचना चाहिए।
यह निर्णय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने सुनाया। पीठ ने 2001 में दिए गए प्रसिद्ध निर्णय ‘Re: K, A Judicial Officer’ का हवाला देते हुए कहा:
❝सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में यह विधि स्पष्ट है कि उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध न्यायिक आदेशों में कठोर टिप्पणियाँ करने से सामान्यतः परहेज़ करना चाहिए।❞
🔍 मामले की पृष्ठभूमि: ज़मानत, समानता और आपत्ति
वर्ष 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 323, 341, 325, 307, 427 पढ़ी गई धारा 149 के तहत कई व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई, जिनमें सेठू उर्फ अंग्रेज़ और सेठू उर्फ हड्डी नामक दो आरोपी शामिल थे।
- हाईकोर्ट ने सेठू उर्फ हड्डी को ज़मानत दी, यह कहते हुए कि घातक चोट का आरोप दूसरे आरोपी अंग्रेज़ पर था।
- बाद में, सेठू उर्फ अंग्रेज़ की ज़मानत याचिका को एकल न्यायाधीश ने खारिज कर दिया।
तीन अलग-अलग ज़मानत याचिकाएँ उस समय के जिला न्यायाधीश कैडर के अधिकारी (अपीलकर्ता) के समक्ष आईं, जिन्होंने ‘समानता के सिद्धांत’ के आधार पर सभी को ज़मानत दे दी।
बाद में, यह सामने आया कि सेठू उर्फ अंग्रेज़ के अपराध के पूर्ववृत्त (criminal antecedents) को याचिका में उजागर नहीं किया गया था। शिकायतकर्ता ने ज़मानत रद्द करने की याचिका दाखिल की, जिसे मंज़ूरी दे दी गई। साथ ही, यह भी कहा गया कि अभियुक्त के वकील ने कोर्ट को गुमराह किया।
⚖️ हाईकोर्ट की कठोर टिप्पणियाँ और सुप्रीम कोर्ट की फटकार
इसके बाद हाईकोर्ट ने, सेठू उर्फ अंग्रेज़ की याचिका खारिज करते हुए, ज़मानत देने वाले न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध कटाक्षपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। न्यायालय ने कहा कि ज़मानत आदेश “लापरवाहीपूर्वक और अनुचित ढंग से” दिया गया, और आदेश की प्रति राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजने का निर्देश दिया।
इससे आहत होकर, संबंधित न्यायिक अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
🧭 सुप्रीम कोर्ट की विवेचना: सुनवाई का अवसर दिए बिना टिप्पणियाँ अनुचित
पीठ ने स्पष्ट किया कि:
- हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को कोई स्पष्टीकरण देने या कारण बताने का अवसर दिए बिना कठोर टिप्पणियाँ कीं।
- उच्च न्यायालय के आदेश की आधारशिला “जुगल” मामले पर रखी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में “अयूब खान बनाम राजस्थान राज्य” (निर्णय दिनांक 17 दिसंबर 2024) में पलट दिया था।
पीठ ने अंततः कहा:
❝उपरोक्त परिस्थितियों में यह टिप्पणियाँ अनावश्यक और अनुचित थीं। अतः हम इन्हें अभिलेख से बाहर करते हैं।❞
📌 भविष्य के लिए सुझाव: अपराध इतिहास का प्रकटीकरण अनिवार्य हो
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि हाईकोर्ट ऐसी प्रक्रिया अपनाएँ जिससे ज़मानत के लिए आवेदन करने वाले अभियुक्तों को अपने विरुद्ध पूर्व में दर्ज मामलों की जानकारी देना अनिवार्य हो।
🧾 मामले का शीर्षक:
Kaushal Singh v. The State of Rajasthan
(Neutral Citation: 2025 INSC 871)
