सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किराए निर्धारण आदेश के खिलाफ अपील लंबित होने से किराया न देना जायज़ नहीं माना जा सकता। बिना स्टे के गैर-भुगतान को जानबूझकर चूक (willful default) माना जाएगा। कोर्ट ने कहा—नोटिस न होने पर भी Rent Controller ‘willfulness’ तय कर सकता है।
Supreme Court: अपील लंबित होने मात्र से किराया न देना माफी नहीं—देरी से भुगतान ‘Willful Default’, बेदखली सही
अपील लंबित रहने पर किराया रोकना ‘Willful Default’: सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली आदेश को सही ठहराया
किराया नियमन से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस Dipankar Datta और जस्टिस Manmohan की पीठ ने यह साफ कर दिया कि केवल अपील लंबित होने से किराए का भुगतान रोकना वैध रक्षा नहीं है। यदि किरायेदार किराया निर्धारण के न्यायिक आदेश को चुनौती देता है, परंतु स्टे नहीं लेता, तो किराया न देना जानबूझकर चूक (willful default) माना जाएगा।
🔹 मामले की पृष्ठभूमि
कोयंबटूर में 15,500 वर्ग फुट के गोदाम को कई समझौतों के तहत किरायेदार को 1999–2001 के बीच दिया गया था।
मकान मालिक के अनुसार कुल किराया ₹48,000/माह, लेकिन किरायेदार का दावा ₹33,000/माह था।
मकान मालिक ने 2004 में Rent Controller में fair rent तय करने का आवेदन किया।
Rent Controller का आदेश (10.01.2007):
- न्यायसंगत किराया (Fair Rent): ₹2,43,600 प्रति माह
- प्रभाव: 01.02.2005 से लागू
लेकिन किरायेदार ने इसके बावजूद केवल ₹48,000/माह ही दिया।
इससे ₹68,87,400/- के बकाया जमा हो गए।
किरायेदार ने कभी भी आदेश पर स्टे नहीं लिया।
हाईकोर्ट (09.09.2011):
- Fair Rent थोड़ा कम करके ₹2,37,500/माह किया
- मकान मालिक ने ₹1,22,22,000 बकाया की मांग की
इसके बावजूद किरायेदार ने आंशिक भुगतान किए और विवाद बढ़ता गया।
सुप्रीम कोर्ट (23.03.2012):
किरायेदार को बकाया ₹15,00,000 मासिक किस्त में चुकाने और नियमित किराया देने का निर्देश दिया, बिना prejudice के।
फिर भी मकान मालिक ने service tax, interest और arrears के लिए बेदखली (eviction) की कार्यवाही शुरू की।
🔹 प्रक्रिया का इतिहास
| मंच | फैसला |
|---|---|
| Rent Controller (2019) | कोई willful default नहीं |
| Appellate Court (2020) | किरायेदार की लगातार देरी = willful default |
| हाईकोर्ट (2021) | बेदखली सही, कोई स्टे नहीं था, arrears जानबूझकर नहीं चुकाए गए |
🔥 सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
✔️ अपील लंबित होना = स्टे नहीं
कोर्ट ने Order XLI Rule 5(1) CPC का हवाला देते हुए कहा:
“Appeal का दाखिल होना अपने-आप में स्टे नहीं होता।”
“जब तक superior court stay न दे, आदेश लागू रहता है।”
किरायेदार ने:
- स्टे नहीं लिया
- लंबी देरी से, केवल मुकदमेबाजी के दबाव में भुगतान किया
अतः कोर्ट ने कहा:
“ऐसा आचरण bona fide नहीं, बल्कि विलफुल डिफॉल्ट है।”
✔️ अनिश्चितता का बहाना स्वीकार नहीं
कोर्ट ने कहा कि किराया किन्तु कितना देना है, इस पर विवाद होने मात्र से:
- भुगतान रोकना जायज नहीं
- खासकर जब कानूनी निर्धारण मौजूद हो
किरायेदार की दलील कि fair rent appeal में चुनौती थी इसलिए संदेह था, को कोर्ट ने खारिज किया।
✔️ दो महीने की नोटिस अवधि (Section 10(2)(i)) अनिवार्य शर्त नहीं
किरायेदार ने कहा—बिना नोटिस कार्यवाही अवैध है।
कोर्ट ने कहा:
“Notice सिर्फ एक अतिरिक्त सुविधा है, बाध्यकारी पूर्व-शर्त नहीं।
Rent Controller अपनी विवेक शक्ति से ‘willfulness’ तय कर सकता है।”
✔️ Judicial Finality का गलत सहारा
कोर्ट ने कहा कि:
“Judicial finality की आड़ लेकर किरायेदार यह दावा नहीं कर सकता कि अपील लंबित थी इसलिए भुगतान न करना उचित था।”
“जब तक stay न हो, आदेश लागू रहेगा।”
अंतिम आदेश
- Supreme Court ने High Court और Appellate Court की findings को सही ठहराया
- किरायेदार को Willful Defaulter माना
- बेदखली (eviction) सही और वैध घोषित की
Case Title: K. Subramaniam v. Krishna Mills (P) Ltd.
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