Charge Sheet पर हस्ताक्षर न होने से ट्रायल रद्द नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 482 के तहत आदेश रद्द कर दिया और नए सिरे से ट्रायल (de novo trial) का आदेश दे दिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्ज पर हस्ताक्षर न होना केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि है, इससे ट्रायल स्वतः रद्द नहीं होगा जब तक न्याय की विफलता साबित न हो। Sandeep Yadav v. Satish केस में अहम फैसला।


तकनीकी त्रुटि से ट्रायल रद्द नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक कानून निर्णय में कहा कि यदि आरोप (charge) पर हस्ताक्षर नहीं हैं, तो यह स्वतः पूरे ट्रायल को अवैध नहीं बनाता। जब तक यह साबित न हो कि इससे आरोपी को वास्तविक नुकसान (failure of justice) हुआ है, तब तक इसे केवल curable procedural irregularity माना जाएगा।

यह फैसला Sandeep Yadav v. Satish मामले में जस्टिस Ahsanuddin Amanullah और जस्टिस R Mahadevan की डिवीजन बेंच ने दिया।

कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें नए सिरे से ट्रायल (de novo trial) का निर्देश दिया गया था।


जमीन विवाद से जुड़ा था आपराधिक मामला

यह मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के क्वार्सी थाना में दर्ज FIR से संबंधित था। मामला जमीन विवाद से जुड़े हिंसक हमले का था जिसमें आरोपियों ने कथित रूप से फायरिंग की, कई लोग घायल हुए और नाहर सिंह नामक व्यक्ति की मृत्यु हो गई।

मामले में IPC की धाराएँ 147, 148, 149, 307, 302, 120B और Criminal Law Amendment Act की धारा 7 लगाई गई थीं। अपीलकर्ता मृतक का पुत्र था।


2009 में चार्ज बने, लेकिन हस्ताक्षर नहीं हुए

जांच के बाद चार्जशीट दाखिल हुई और मामला सेशन कोर्ट भेजा गया।
27 मार्च 2009 को आरोप तय किए गए, लेकिन एक आरोपी की अनुपस्थिति के कारण चार्ज पर औपचारिक हस्ताक्षर नहीं हो पाए।

1 जून 2009 को सभी आरोपी अदालत में उपस्थित हुए और अदालत ने रिकॉर्ड में दर्ज किया कि आरोप तय हो चुके हैं। इसके बाद ट्रायल सामान्य रूप से चलता रहा और वर्षों तक गवाहों की गवाही होती रही।

जब मामला CrPC की धारा 313 के बयान के चरण में पहुंचा, तब यह पाया गया कि चार्ज पर हस्ताक्षर नहीं हैं। इसके बाद 11 सितंबर 2024 को अदालत ने दोबारा आरोप तय किए।

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हाईकोर्ट ने नए ट्रायल का आदेश दिया

ट्रायल कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2024 को आदेश दिया कि पहले से दर्ज साक्ष्य को ही माना जाए और ट्रायल आगे बढ़े।

लेकिन हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 482 के तहत आदेश रद्द कर दिया और नए सिरे से ट्रायल (de novo trial) का आदेश दे दिया।

इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।


सुप्रीम कोर्ट: चार्ज का उद्देश्य आरोपी को जानकारी देना

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्ज तय करने का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी को आरोपों की पूरी जानकारी हो और उसे निष्पक्ष ट्रायल मिले।

कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य तकनीकी त्रुटियों के आधार पर ट्रायल को विफल करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करना है।

कोर्ट ने पुराने फैसले Willie (William) Slaney v State of Madhya Pradesh का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि आरोपी को आरोपों की पूरी जानकारी थी और ट्रायल निष्पक्ष हुआ, तो केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि से ट्रायल रद्द नहीं होगा।


अवैधता और प्रक्रियात्मक त्रुटि में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • Illegality – जो ट्रायल की जड़ पर असर डाले
  • Irregularity – प्रक्रिया में त्रुटि, जिससे ट्रायल स्वतः रद्द नहीं होता

कोर्ट ने कहा कि चार्ज पर हस्ताक्षर न होना illegality नहीं बल्कि procedural irregularity है, जिसे CrPC की धारा 215 और 464 के तहत ठीक किया जा सकता है।

जब तक आरोपी यह साबित न करे कि उसे नुकसान हुआ या न्याय की विफलता हुई, तब तक ट्रायल रद्द नहीं होगा।


नए ट्रायल का आदेश केवल असाधारण मामलों में

कोर्ट ने कहा कि de novo trial (नया ट्रायल) केवल असाधारण परिस्थितियों में ही आदेशित किया जा सकता है, जैसे:

  • अदालत के पास अधिकार क्षेत्र न हो
  • गंभीर अवैधता हो
  • पक्षकारों को साक्ष्य पेश करने का मौका न मिला हो
  • ट्रायल वास्तव में हुआ ही न हो
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कोर्ट ने State of Madhya Pradesh v Bhooraji, Shamnsaheb M Multtani v State of Karnataka और Ajay Kumar Ghoshal v State of Bihar मामलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल तकनीकी आधार पर नया ट्रायल नहीं कराया जा सकता।


ट्रायल काफी आगे बढ़ चुका था

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • ट्रायल 14 साल से चल रहा था
  • कई गवाहों की गवाही हो चुकी थी
  • कुछ महत्वपूर्ण गवाहों की मृत्यु हो चुकी थी

ऐसी स्थिति में नया ट्रायल कराने से अभियोजन पक्ष को गंभीर नुकसान होता और न्याय प्रभावित होता।

इसलिए कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का नया ट्रायल कराने का आदेश गलत था।


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया
  • ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल किया
  • ट्रायल को उसी चरण से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया
  • ट्रायल जल्द पूरा करने को कहा

फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला आपराधिक कानून में बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  1. चार्ज में त्रुटि से ट्रायल स्वतः रद्द नहीं होगा
  2. Procedural irregularity और illegality अलग चीजें हैं
  3. Failure of justice साबित करना जरूरी है
  4. De novo trial केवल exceptional cases में ही होगा
  5. तकनीकी आधार पर ट्रायल दोबारा नहीं कराया जा सकता

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