WhatsApp–Meta की डेटा शेयरिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘निजता से खिलवाड़ नहीं होने देंगे, संविधान नहीं मानते तो भारत छोड़ दें’

WhatsApp–Meta की डेटा शेयरिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘निजता से खिलवाड़ नहीं होने देंगे, संविधान नहीं मानते तो भारत छोड़ दें’

WhatsApp की 2021 ‘टेक इट ऑर लीव इट’ प्राइवेसी पॉलिसी और Meta की डेटा शेयरिंग प्रैक्टिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इसे निजता के अधिकार और संवैधानिकता का उल्लंघन बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी Meta की डेटा शेयरिंग नीतियों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत में नागरिकों के निजता के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

न्यायालय Competition Commission of India (CCI) द्वारा WhatsApp की 2021 की “take it or leave it” प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर लगाए गए ₹213.14 करोड़ के जुर्माने से जुड़ी अपीलों की सुनवाई कर रहा था।

यह मामला उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें 4 नवंबर 2025 को National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने CCI के जुर्माने को बरकरार रखा था, लेकिन विज्ञापन उद्देश्यों के लिए डेटा शेयरिंग की आंशिक अनुमति दे दी थी। NCLAT ने CCI द्वारा लगाया गया पाँच साल का पूर्ण प्रतिबंध हटाते हुए कहा था कि सीमित डेटा शेयरिंग की जा सकती है। बाद में 15 दिसंबर 2025 को जारी एक स्पष्टीकरण में यह स्पष्ट किया गया कि विज्ञापन और गैर-विज्ञापन, दोनों तरह की डेटा शेयरिंग में यूज़र्स को स्पष्ट opt-out का अधिकार देना अनिवार्य होगा।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे, ने WhatsApp और Meta की अपीलों के साथ-साथ CCI की ओर से दायर अलग अपील पर सुनवाई करते हुए तीखी टिप्पणी की। CJI ने कहा,
“हम एक भी जानकारी शेयर करने की इजाजत नहीं देंगे। आप इस देश में निजता के अधिकार से नहीं खेल सकते।”

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कोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था को “संवैधानिकता का मज़ाक” करार देते हुए सवाल उठाया कि जब उपभोक्ताओं को नीति स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाए, तो ऐसी सहमति को वैध कैसे माना जा सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि कंपनियों के खिलाफ यह पाया गया है कि यूज़र्स से ली गई सहमति वास्तव में “manufactured consent” है।

पीठ ने टेक-कम्युनिकेशन कंपनियों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि या तो वे भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त निजता के अधिकार का सम्मान करें या फिर देश में काम करना बंद कर दें।

CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“अगर आप हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते, तो भारत छोड़ दें। हम नागरिकों की निजता से समझौता नहीं होने देंगे।”

अदालत ने opt-out मैकेनिज़्म की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि तमिलनाडु या बिहार के किसी दूरदराज़ इलाके में रहने वाला रेहड़ी-पटरी वाला व्यक्ति या सामान्य उपभोक्ता प्राइवेसी पॉलिसी की “चालाक भाषा” को समझ ही नहीं पाता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उपभोक्ताओं का व्यावसायिक शोषण किया जा रहा है और “खामोश उपभोक्ता” इस व्यवस्था के शिकार हैं, जिनकी कोई आवाज़ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यूज़र्स को इन प्लेटफॉर्म्स का “आदी” बना दिया गया है और असली विकल्प यह नहीं है कि उन्हें चेतावनी दी गई या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उन्हें शर्तें मानने के लिए मजबूर किया गया।

CJI ने कहा,

“यह निजता की चोरी करने का एक सभ्य तरीका है। इस देश में निजता के अधिकार की अत्यंत सख्ती से रक्षा की जाती है और हम इसके उल्लंघन की अनुमति नहीं देंगे।”

कोर्ट ने मामले में अंतरिम निर्देश जारी करने के उद्देश्य से सुनवाई 9 फरवरी को सूचीबद्ध की है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के संयुक्त अनुरोध पर केंद्र सरकार को भी प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाया गया है और उसे काउंटर एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति दी गई है।

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