पुणे पोर्शे केस: सैंपल से छेड़छाड़ मामले में डॉक्टर को सुप्रीम कोर्ट से जमानत

अदालत ने आरोपों की गंभीरता पर टिप्पणी किए बिना जमानत के सिद्धांत—विशेषकर ‘पैरिटी’—को प्राथमिकता दी

सुप्रीम कोर्ट ने पुणे पोर्शे हादसे में ब्लड सैंपल से छेड़छाड़ के आरोपी ससून अस्पताल के पूर्व अधीक्षक डॉ. अजय तावरे को जमानत दी। समानता के आधार पर राहत, सभी चार आरोपी अब बेल पर।

Supreme Court of India ने शुक्रवार को पुणे पोर्शे हादसे से जुड़े बहुचर्चित ब्लड सैंपल छेड़छाड़ मामले में बड़ी राहत देते हुए ससून जनरल अस्पताल के पूर्व मेडिकल अधीक्षक डॉ. अजय तावरे को जमानत दे दी। अदालत ने यह राहत “समानता के आधार” (parity) पर दी, क्योंकि इसी मामले में अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

न्यायमूर्ति B V Nagarathna और न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की पीठ ने आदेश पारित करते हुए कहा कि चूंकि अन्य आरोपियों को राहत मिल चुकी है, इसलिए डॉ. तावरे को भी जमानत दी जाती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 19 मई 2024 का है, जब पुणे के कल्याणी नगर इलाके में एक लग्जरी कार दुर्घटना में दो आईटी पेशेवरों की मौत हो गई थी। आरोप है कि एक 17 वर्षीय किशोर, जो कथित रूप से नशे की हालत में था, पोर्शे कार चला रहा था।

दुर्घटना के बाद सामने आया कि किशोर के ब्लड सैंपल में कथित तौर पर हेरफेर किया गया। जांच एजेंसियों का आरोप है कि अस्पताल और अन्य व्यक्तियों की मिलीभगत से रक्त के नमूने बदले गए, ताकि शराब पीने की पुष्टि न हो सके।

किन-किन को मिली राहत?

डॉ. अजय तावरे के साथ इस मामले में कुल चार आरोपी थे—

  • अमर संतोष गायकवाड़ (कथित बिचौलिया),
  • आदित्य अविनाश सूद,
  • आशीष सतीश मित्तल,
  • और डॉ. अजय तावरे।
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सूद और मित्तल उन दो अन्य किशोरों के अभिभावक बताए जाते हैं, जो दुर्घटना के समय कार में सवार थे, जिनमें एक किशोर पिछली सीट पर बैठा था।

2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने गायकवाड़, सूद और मित्तल को जमानत देते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसे मामलों में नाबालिगों से ज्यादा उनके अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि बच्चों पर नियंत्रण और निगरानी का दायित्व माता-पिता का होता है।

अब डॉ. तावरे को भी राहत मिलने के बाद चारों आरोपी शीर्ष अदालत से जमानत हासिल कर चुके हैं।

18 महीने हिरासत में रहे आरोपी

गायकवाड़, सूद और मित्तल लगभग 18 महीने तक न्यायिक हिरासत में रहे थे, जिसके बाद उन्हें जमानत मिली। 23 जनवरी को अदालत ने गायकवाड़ की जमानत याचिका पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था। इससे पहले 7 जनवरी को सूद और मित्तल की जमानत याचिकाओं पर भी राज्य सरकार से प्रतिक्रिया तलब की गई थी।

डॉ. तावरे की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान भी राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखा, लेकिन पीठ ने अन्य सह-आरोपियों को दी गई राहत को देखते हुए समानता का सिद्धांत लागू किया।

कानूनी महत्व

यह आदेश इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि अदालत ने आरोपों की गंभीरता पर टिप्पणी किए बिना जमानत के सिद्धांत—विशेषकर ‘पैरिटी’—को प्राथमिकता दी। आपराधिक न्यायशास्त्र में यह स्थापित सिद्धांत है कि यदि समान भूमिका और परिस्थितियों वाले सह-आरोपी को जमानत मिल चुकी है, तो अन्य आरोपी को भी समान राहत दी जा सकती है, जब तक कोई विशिष्ट अंतर न हो।

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हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जमानत का अर्थ आरोपों से मुक्ति नहीं है। ट्रायल जारी रहेगा और दोष सिद्ध या असिद्ध होने का निर्णय निचली अदालत करेगी।

पुणे पोर्शे हादसा पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन चुका है—विशेषकर नाबालिगों द्वारा लग्जरी कार चलाने, अभिभावकों की जिम्मेदारी और साक्ष्य से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों को लेकर।

अब सभी आरोपियों के जमानत पर बाहर आने के बाद मामले की निगाहें ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं।


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