भाई‑बहनों के बीच हैदराबाद की प्राइम संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया को मध्यस्थ नियुक्त करते हुए पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद की एक प्राइम संपत्ति को लेकर भाई और उसकी बहनों के बीच वर्षों से चले आ रहे विवाद में सुलह की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया को मध्यस्थ नियुक्त किया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई के दौरान पारित किया।
‘लंबी कानूनी लड़ाई’ को खत्म करने पर जोर
अदालत ने मामले को “भाई और बहनों के बीच लंबा चला आ रहा कानूनी संघर्ष” बताते हुए कहा कि यदि पक्षकार आपसी बातचीत से समाधान नहीं निकालते हैं, तो यह विवाद और अधिक लंबा खिंच सकता है।
पीठ ने टिप्पणी की कि,
“अदालत अब भी इस दृढ़ मत पर है कि पक्षकारों को बैठकर बातचीत करनी चाहिए और एक न्यायसंगत समझौते पर पहुंचना चाहिए।”
विवाद की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता‑भाई ने विवादित संपत्ति पर ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (GHMC) से निर्माण अनुमति प्राप्त की थी, जो डेवलपर एम/एस ऑरेंज एवेन्यूज़ के माध्यम से ली गई थी।
बाद में GHMC ने GHMC अधिनियम की धारा 450 के तहत यह अनुमति रद्द कर दी। निगम का आरोप था कि वर्ष 2020 में दी गई अंडरटेकिंग में 2016 में दायर विभाजन वाद (partition suit) और संपत्ति से संबंधित निषेधाज्ञा आदेशों का खुलासा नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने रद्दीकरण को ठहराया था सही
तेलंगाना हाईकोर्ट ने GHMC के फैसले को सही ठहराते हुए कहा था कि महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा न करना (suppression of material facts) घातक है और इसी आधार पर निर्माण अनुमति रद्द की जा सकती है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि:
- मूल आवेदन वर्ष 2014 में किया गया था, जो विभाजन वाद से पहले का है,
- निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और तृतीय पक्ष अधिकार (third‑party rights) भी बन चुके हैं,
- बाद में उत्पन्न पारिवारिक विवाद के आधार पर निर्माण अनुमति को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
मामले में मध्यस्थता को प्राथमिकता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्न निर्देश पारित किए:
- देरी को माफ किया गया,
- जस्टिस सुधांशु धूलिया (पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज) को मध्यस्थ नियुक्त किया गया,
- रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि मध्यस्थ को तत्काल सूचित किया जाए,
- मध्यस्थता की फीस और प्रक्रिया पक्षकारों से परामर्श कर तय की जाएगी,
- संपत्ति की प्रकृति, स्वरूप और कब्जे के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया,
- मध्यस्थ की रिपोर्ट आने के बाद मामले की आगे सुनवाई की जाएगी।
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