सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक कथित मामले में आरोपी को बरी किया, कहा – सहमति के अभाव का स्पष्ट प्रमाण न होना IPC 376 के आरोप को टिकाए नहीं रख सकता

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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में बलात्कार के एक कथित मामले में आरोपी को बरी कर दिया है। न्यायालय ने यह निर्णय इस आधार पर सुनाया कि पीड़िता ने केवल यौन संबंध स्थापित होने की बात स्वीकार की थी, परन्तु यह नहीं कहा कि यह उसकी इच्छा के विरुद्ध हुआ। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए ‘सहमति का अभाव’ अनिवार्य है।

यह अपील तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें आरोपी को आईपीसी की धारा 376, 363 और 342 के तहत दोषी ठहराया गया था। हालांकि उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए आरोपी की सजा में कुछ कमी की थी।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया,

“हम पाते हैं कि यह आरोप टिक नहीं सकता, क्योंकि पीड़िता ने केवल यौन संबंध होने की बात कही है, लेकिन यह नहीं दर्शाया कि वह उसकी इच्छा के विरुद्ध था। सहमति का अभाव धारा 376 के तहत अभियोग के लिए अनिवार्य है, जो कि इस मामले में साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध नहीं होता।”

अधिवक्ता हर्षा त्रिपाठी ने अपीलकर्ता की ओर से जबकि एओआर देवीना सहगल ने राज्य की ओर से पक्ष रखा।


⚖️ मामले की पृष्ठभूमि:

अपीलकर्ता, पीड़िता के भाई (PW-4) का मित्र था और अक्सर उसके घर आता-जाता था। इसी दौरान उसकी जान-पहचान पीड़िता (PW-3) से हुई, जो उस समय स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। एक दिन, वह पीड़िता को हैदराबाद ले गया और वहां हल्दी का धागा उसकी गर्दन में बांधकर यह आभास कराया कि दोनों ने विवाह कर लिया है। आरोप था कि इसके बाद आरोपी ने पीड़िता को एक कमरे में बंद कर दिया और दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रहने लगे तथा यौन संबंध बनाए।

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कुछ समय पश्चात आरोपी एक दुर्घटना में घायल हो गया और अस्पताल में भर्ती हुआ। तभी पीड़िता अपनी मां के पास पहुंची और पूरी बात बताई, जिसके बाद शिकायत दर्ज की गई।

डॉक्टर (PW-9) द्वारा आरोपी की यौन क्षमता की पुष्टि भी की गई। आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 366A, 342 और 376 के तहत आरोप तय किए गए, जिन्हें उसने नकारते हुए मुकदमे की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने उसे धारा 363, 342 और 376 के तहत दोषी माना, लेकिन धारा 366A के तहत बरी कर दिया। उच्च न्यायालय ने सजा में कमी की, पर दोषसिद्धि कायम रखी। इसके विरुद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई।


🧾 सुप्रीम कोर्ट की दलीलें और निष्कर्ष:

🔹 पीड़िता की उम्र पर संदेह:

न्यायालय ने देखा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि की पुष्टि उसके परिवार से नहीं कर सका। स्कूल प्रमाणपत्र के अलावा कोई पुष्टिकारक साक्ष्य नहीं था। अतः यह साबित नहीं हो पाया कि पीड़िता की उम्र उस समय 16 या 18 वर्ष से कम थी।

🔹 स्वेच्छा से साथ जाने की बात स्वीकार:

पीड़िता ने खुद स्वीकार किया कि वह आरोपी के साथ स्वेच्छा से मोटरसाइकिल पर गई थी और करीब दो महीने तक साथ रही। न तो जबरदस्ती, न छल, न बहलाने-फुसलाने की बात सामने आई।

🔹 गुमशुदगी की रिपोर्ट में देरी:

पीड़िता की मां द्वारा चार दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराना भी संदेह पैदा करता है।

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🔹 बलात्कार के आरोप पर दृष्टिकोण:

खंडपीठ ने दोहराया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत हो, तो उसी के आधार पर दोषसिद्धि संभव है। परन्तु, जब उसकी गवाही में विरोधाभास हों, या चिकित्सा या परिस्थितिजन्य साक्ष्य उसे समर्थन न दें, तो अकेली गवाही पर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती।

🔹 तीनों आरोपों से दोषमुक्ति:

न्यायालय ने कहा कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि पीड़िता की मर्जी के खिलाफ यौन संबंध बनाए गए, उसे जबरन अगवा किया गया या दो महीने तक उसकी मर्जी के विरुद्ध कैद में रखा गया।

“हमारे समक्ष कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने पीड़िता को उसके संरक्षकों से अगवा किया, या उसकी इच्छा के विरुद्ध हैदराबाद में दो महीने तक कैद रखा, अथवा बलपूर्वक यौन संबंध बनाए,” — खंडपीठ ने कहा।


मामला: बिर्का शिवा बनाम तेलंगाना राज्य
न्यूट्रल साइटेशन: 2025 INSC 863

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