दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की पीड़िता की सहमति का कोई कानूनी मूल्य नहीं होता। कोर्ट ने पॉक्सो मामले में ट्रायल कोर्ट की सजा बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज की, कहा — “नाबालिग के मामलों में सहमति निरर्थक है।”
📰 दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त रुख — “नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी मूल्य नहीं”, POCSO केस में दोषसिद्धि बरकरार
नई दिल्ली | विधि संवाददाता:
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि 18 वर्ष से कम आयु की पीड़िता की सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता और इस तरह के मामलों में अदालत को केवल पीड़िता के बयान और आयु-प्रमाण के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की एकल पीठ ने 2017 के एक पॉक्सो (POCSO) मामले में आरोपी रसूल आजम की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म का दोषी ठहराया था।
⚖️ मामला और पृष्ठभूमि
यह मामला रणहोला थाना क्षेत्र का है। शिकायत के अनुसार, 16 अक्टूबर 2017 को पीड़िता अचानक घर से लापता हो गई थी। पीड़िता के पिता ने पुलिस को बताया कि बेटी घर से बिना बताए निकल गई थी। बाद में वह खुद पिता के साथ थाने पहुंची।
मेडिकल जांच के दौरान पीड़िता ने बताया कि वह पहले बिहार गई और फिर दिल्ली लौटकर आरोपी रसूल आजम के पास रही। उसने शुरू में यह कहा कि उसने आरोपी के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान में स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के आरोप लगाए।
इसी आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 IPC 376 (दुष्कर्म) जोड़ी और अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया।
⚖️ सबूत और साक्ष्य
ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के स्कूल रिकॉर्ड और पिता के हलफनामे के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि घटना के समय पीड़िता की उम्र केवल 14 वर्ष थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस निष्कर्ष को सही ठहराते हुए कहा कि स्कूल का एडमिशन-विदड्रॉल रजिस्टर उम्र निर्धारण के लिए एक विश्वसनीय साक्ष्य है और इसे खारिज करने का कोई कारण नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि जब पीड़िता अवयस्क थी, तब उसकी किसी भी प्रकार की “सहमति” कानूनी रूप से अप्रासंगिक मानी जाएगी।
⚖️ अदालत की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति ओहरी ने कहा —
“POCSO अधिनियम का उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है। इस अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति की सहमति को वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में सहमति का दावा स्वतः ही निरर्थक हो जाता है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी द्वारा यह तर्क देना कि पीड़िता ‘सहमति से गई थी’, कानून की दृष्टि में अस्वीकार्य है क्योंकि सहमति देने की उसकी कानूनी क्षमता ही नहीं थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सबूतों पर आधारित था और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि या अन्याय नहीं पाया गया।
⚖️ फैसला और सजा बरकरार
ट्रायल कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को आरोपी रसूल आजम को दोषी ठहराया था और 15 अप्रैल 2023 को सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, परंतु अदालत ने कहा कि नाबालिग के मामलों में सहमति अप्रासंगिक है और अपहरण व दुष्कर्म के आरोप सही पाए जाने पर सजा पूरी तरह उचित है।
इस प्रकार, दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।
⚖️ कानूनी दृष्टिकोण
यह फैसला पुनः इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि —
“18 वर्ष से कम आयु की किसी भी लड़की की सहमति को यौन अपराधों के मामलों में कानूनी सहमति नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि POCSO अधिनियम का उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि समाज में यह संदेश देना भी है कि नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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