‘समाजसेवा तो मुफ्त है’ तो इसकेलिए 1 करोड़ की फीस क्यों? CJI ने वकील को दिखाया आइना

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‘समाजसेवा तो मुफ्त है’: CJI की टिप्पणी, पूर्व CJI दीपक मिश्रा के लिए ₹1 करोड़ फीस मांगने वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI दीपक मिश्रा के समर्थन में दायर मामलों के बदले ₹1 करोड़ फीस मांगने वाली याचिका खारिज कर दी। CJI सूर्य कांत की पीठ ने कहा कि यदि यह समाजसेवा थी तो उसके लिए फीस का दावा नहीं किया जा सकता।


Supreme Court of India ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश के समर्थन में दायर याचिकाओं के बदले ₹1 करोड़ की फीस मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने इसे “समाजसेवा” के रूप में किया है, तो उसके लिए धनराशि का दावा नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश Chief Justice of India Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान की।

वकील ने मांगी थी ₹1 करोड़ फीस

मामला अधिवक्ता Ashok Pandey द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश Deepak Misra के खिलाफ कथित “अपमान और महाभियोग प्रयासों” के दौरान उन्हें बचाने के लिए कई याचिकाएं दायर की थीं।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि Ministry of Law and Justice, India को निर्देश दिया जाए कि उन्हें ₹1 करोड़ फीस और खर्च के रूप में दिया जाए

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने स्वयं व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर याचिकाएं दायर की थीं, तो फिर खर्च की मांग कैसे की जा सकती है।

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CJI ने कहा:
“आप कहते हैं कि आपने समाजसेवा की है। समाजसेवा तो अनमोल होती है और मुफ्त होती है। फिर इसके लिए एक करोड़ रुपये कैसे मांगे जा सकते हैं?”

अदालत ने आगे कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए सही निर्णय लिया था और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

याचिकाकर्ता का तर्क

सुनवाई के दौरान अशोक पांडे ने कहा कि उस समय कुछ न्यायाधीशों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसके कारण उन्हें अदालत में जाकर उनके सम्मान की रक्षा करनी पड़ी।

उन्होंने अदालत से कहा कि उन्होंने न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया था।

हाईकोर्ट ने भी याचिका खारिज की थी

इससे पहले Allahabad High Court की पीठ—न्यायमूर्ति Justice Rajan Roy और न्यायमूर्ति Justice Om Prakash Shukla—ने भी इस याचिका को खारिज कर दिया था।

हाईकोर्ट ने न केवल याचिका को अस्वीकार किया बल्कि संविधान के Article 134A of the Constitution of India के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया था।

2018 के महाभियोग विवाद से जुड़ा मामला

यह विवाद वर्ष 2018 की उस घटना से जुड़ा है जब सात राजनीतिक दलों के 71 राज्यसभा सांसदों ने तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया था।

हालांकि उस समय के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति M. Venkaiah Naidu ने यह कहते हुए नोटिस खारिज कर दिया था कि उसमें पर्याप्त आधार नहीं हैं

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह सही है और इसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

पीठ ने याचिकाकर्ता की मांग को अस्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि यदि किसी ने न्यायपालिका की रक्षा के लिए पहल की है, तो उसे समाजसेवा के रूप में ही देखा जाएगा, न कि भुगतान योग्य सेवा के रूप में


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