SC ने नाबालिग को मां की जाति पर SC प्रमाणपत्र देने की अनुमति दी, जाति निर्धारण के कानून पर नई बहस शुरू


सुप्रीम कोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची को उसकी मां की ‘आदि द्रविड़’ जाति के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र देने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि प्रमाणपत्र न मिलने से बच्ची की शिक्षा और भविष्य प्रभावित होगा। यह फैसला जाति निर्धारण में पिता की जाति को प्राथमिकता देने वाले परंपरागत सिद्धांत पर नए सवाल उठाता है।

SC ने नाबालिग को मां की जाति पर SC प्रमाणपत्र देने की अनुमति दी, जाति निर्धारण के कानून पर नई बहस शुरू


सुप्रीम कोर्ट ने मां की जाति के आधार पर नाबालिग को SC प्रमाणपत्र देने की अनुमति दी, जाति निर्धारण के नियमों पर शुरू हुई नई कानूनी बहस

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने जाति निर्धारण से जुड़े परंपरागत सिद्धांतों पर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने एक नाबालिग बच्ची को उसकी मां की जाति ‘आदि द्रविड़’ के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति देते हुए कहा कि यदि प्रमाणपत्र समय पर नहीं मिला, तो बच्ची की शिक्षा और भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब शीर्ष अदालत के समक्ष कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें पितृसत्तात्मक जाति निर्धारण नियम—जिसके अंतर्गत बच्चे की जाति पिता की जाति से तय होती है—को चुनौती दी गई है।

मद्रास हाई कोर्ट का आदेश बरकरार, SC ने चुनौती लेने से किया इनकार

यह मामला पुदुचेरी की एक महिला से जुड़ा है, जिसने तहसीलदार से अपने तीन बच्चों—दो बेटियों और एक बेटे—के लिए मां की जाति के आधार पर SC प्रमाणपत्र मांगा था। महिला ने दावा किया कि उसके माता-पिता और पूर्वज सभी ‘आदि द्रविड़’ समुदाय से हैं और विवाह के बाद उसका पति भी उसके मायके में ही रहने लगा।

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मद्रास हाई कोर्ट ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए बच्ची को SC प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया था। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

CJI ने स्पष्ट कहा:

“यदि बच्ची को समय पर जाति प्रमाणपत्र नहीं मिला, तो उसका भविष्य प्रभावित होगा।”

यह टिप्पणी अदालत की उस संवेदनशील दृष्टि को दर्शाती है, जो वह ऐसी स्थितियों में अपनाती है जहाँ बच्चे की शिक्षा और विकास दांव पर हों।

CJI की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस: “मां की जाति क्यों नहीं?”

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने बड़ी कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दिया। उन्होंने पूछा:

“जब परिस्थितियां बदल रही हैं, तो फिर मां की जाति के आधार पर जाति प्रमाणपत्र क्यों नहीं जारी किया जा सकता?”

इस टिप्पणी के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। यदि भविष्य में न्यायालय इस सिद्धांत को मान्यता देता है, तो ऐसे बच्चे—जो SC मां और उच्च जाति के पिता से जन्मे हों—उच्च जाति के परिवेश में पलने के बावजूद SC प्रमाणपत्र के हकदार हो सकते हैं।

कई विशेषज्ञ इसे पितृसत्तात्मक जाति प्रणाली की न्यायिक पुनर्विचार प्रक्रिया का संकेत मान रहे हैं।

पिता की जाति से तय होने वाली परंपरा

भारत में जाति निर्धारण का आधार लंबे समय से पिता की जाति रही है।

  • 1964 और 2002 की अधिसूचनाएँ
  • गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देश
  • और सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय

इसी सिद्धांत को सम्मत देते रहे हैं।

2003 के पुनित राय बनाम दिनेश चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण मामलों में जाति निर्धारण का निर्णायक आधार पिता की जाति होगी।

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2012: सुप्रीम कोर्ट का ‘लचीला सिद्धांत’

रमेशभाई नाइका बनाम गुजरात सरकार (2012) में अदालत ने कहा कि जाति निर्धारण केवल पिता की जाति के आधार पर तय नहीं किया जा सकता, विशेषकर अंतरजातीय विवाहों में। अदालत ने कहा कि यदि बच्चा मां के सामाजिक परिवेश में पला है और वही भेदभाव और वंचना झेली है, तो उसे मां की जाति से संबंधित माना जा सकता है।

ताज़ा फैसला: बच्ची का हित सर्वोपरि, बड़ा प्रश्न अभी खुला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह बड़े संवैधानिक प्रश्न—“क्या बच्चे की जाति मां की जाति पर निर्भर हो सकती है?”—को भविष्य के लिए खुला रख रही है। यह फैसला केवल इस बच्ची के हित को देखते हुए दिया गया है।

फिर भी, यह निर्णय जाति-प्रमाणपत्र, आरक्षण और अंतरजातीय विवाह से जुड़े अधिकारों पर नई बहस को जन्म देगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अदालत मां की जाति को निर्णायक मानने की दिशा में बढ़ती है, तो यह सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।

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