पुणे फैमिली कोर्ट: शारीरिक संबंध बनाने से इनकार पर शादी निरस्त

विवाह केवल औपचारिक रिश्ता नहीं, वैवाहिक दायित्वों पर आधारित संस्था

पुणे फैमिली कोर्ट Pune Family Court ने पति द्वारा वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार स्वीकार करने के बाद हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा—विवाह केवल औपचारिक रिश्ता नहीं, वैवाहिक दायित्वों पर आधारित संस्था है।


महाराष्ट्र के Pune से सामने आए एक संवेदनशील मामले में फैमिली कोर्ट ने वैवाहिक संबंध स्थापित न होने के आधार पर विवाह को निरस्त (Annul) कर दिया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि पति-पत्नी के बीच सहमतिपूर्ण शारीरिक संबंध ही स्थापित नहीं होते, तो विवाह का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

यह आदेश फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश बी. डी. कदम ने पारित किया, जब पति ने स्वयं अदालत के समक्ष लिखित रूप में स्वीकार किया कि शादी के बाद दोनों के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं बना।

क्या था मामला?

कोमल और अक्षय (दोनों के नाम बदले हुए) का विवाह शिक्षित परिवारों की सहमति से पंजीकृत रूप में हुआ था। पत्नी के अनुसार, विवाह के बाद उसने सामान्य वैवाहिक जीवन शुरू करने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन पति ने लगातार दूरी बनाए रखी।

पत्नी ने अदालत को बताया कि बार-बार बातचीत और समझाने के बावजूद पति ने वैवाहिक दायित्व निभाने में रुचि नहीं दिखाई। स्थिति असहनीय होने पर वह मायके लौट गई और विवाह निरस्तीकरण की याचिका दायर की।

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कोर्ट में स्वीकारोक्ति बना टर्निंग पॉइंट

सुनवाई के दौरान पति ने लिखित रूप से यह स्वीकार किया कि विवाह के बाद दोनों के बीच कोई सहमतिपूर्ण शारीरिक संबंध नहीं हुआ। चूंकि तथ्यों पर कोई विवाद नहीं था, अदालत ने विस्तृत साक्ष्य और लंबी ट्रायल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं समझी।

Hindu Marriage Act, 1955 के प्रावधानों के तहत, यदि विवाह की मूल शर्तें पूरी न हों और तथ्य निर्विवाद हों, तो अदालत विवाह को निरस्त घोषित कर सकती है। न्यायाधीश ने इसी कानूनी आधार पर विवाह को शून्य घोषित कर दिया।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

फैसले में कहा गया कि विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि वैवाहिक दायित्वों पर आधारित संस्था है। यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित ही नहीं होते, तो वैवाहिक संस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इसलिए जहां तथ्य स्पष्ट हों और प्रतिवादी स्वीकारोक्ति कर चुका हो, वहां लंबी सुनवाई से बचना न्यायसंगत है।

क्यों अहम है यह फैसला?

यह निर्णय भारतीय पारिवारिक न्यायालयों के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह में शारीरिक संबंध केवल निजी विषय नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन का एक आवश्यक तत्व है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला उन मामलों में मार्गदर्शक बन सकता है, जहां विवाह के मूल तत्वों का अभाव हो और दोनों पक्ष विवाद से बचना चाहते हों।

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साथ ही, यह आदेश इस बात पर भी बल देता है कि पारिवारिक विवादों में अदालतें अब व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए शीघ्र समाधान को प्राथमिकता दे रही हैं।


यह मामला याद दिलाता है कि विवाह केवल औपचारिक बंधन नहीं, बल्कि परस्पर सहमति, सम्मान और दायित्वों पर आधारित संबंध है। जब ये आधार ही अनुपस्थित हों, तो कानून वैवाहिक स्वतंत्रता और मानसिक संतुलन की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।


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