दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह दुबई–अबूधाबी स्थित लॉ फर्म Al Maree Partners को आदेश जारी करे ताकि अभिनेता सेलिना जेटली के भाई मेजर (सेवानिवृत्त) विक्रांत जेटली का प्रो बोनो प्रतिनिधित्व किया जा सके। मामला 18 माह से यूएई में हिरासत से जुड़ा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को विदेश मंत्रालय (MEA) को निर्देश दिया कि वह दुबई और अबूधाबी में स्थित लॉ फर्म Al Maree Partners को आवश्यक आदेश जारी करे, ताकि वह यूएई में हिरासत में बंद मेजर (सेवानिवृत्त) विक्रांत जेटली का कानूनी प्रतिनिधित्व कर सके। यह फर्म मामले को पूर्णतः प्रो बोनो (निःशुल्क) आधार पर संभालने के लिए तैयार है।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने यह निर्देश बॉलीवुड अभिनेत्री सेलिना जेटली द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आदेश जारी करने में कोई बाधा है, तो विदेश मंत्रालय उसे हलफनामे के माध्यम से स्पष्ट करे। मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को निर्धारित की गई है।
सेलिना जेटली के भाई मेजर (रि.) विक्रांत जेटली पिछले 18 महीनों से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में हिरासत में हैं। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राघव कैकर ने, अधिवक्ता माधव अग्रवाल और सुरधिष वात्स की सहायता से, अदालत को बताया कि Al Maree Partners ने मामले के तथ्यों को स्वतंत्र रूप से प्राप्त कर लिया है और वह बिना किसी शुल्क के कानूनी सहायता देने को तैयार है।
हालांकि, विदेश मंत्रालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। यह दलील दी गई कि संबंधित लॉ फर्म का नाम उन चार कानूनी फर्मों की सूची में शामिल है, जिन्हें स्वयं विक्रांत जेटली ने सुझाया था। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि विक्रांत जेटली ने दूतावास अधिकारियों को सूचित किया था कि किसी लॉ फर्म को नियुक्त करने का निर्णय उनकी पत्नी चारु जेटली द्वारा लिया जाएगा।
इस पर सेलिना जेटली के वकील ने कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि प्रतिवादी ई-मेल संवाद में सामने आए तथ्यों को दबा रहे हैं। उन्होंने यह भी अदालत को बताया कि विक्रांत जेटली अपनी पत्नी से संवाद नहीं करना चाहते।
न्यायालय ने इस संदर्भ में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा,
“जब कोई लॉ फर्म बिना किसी खर्च के प्रतिनिधित्व के लिए तैयार है, तो इसमें बाधा क्या है? यदि नाम पिता, माता या बहन द्वारा सुझाया गया है, तो इसमें आपत्ति का आधार क्या हो सकता है?”
इससे पहले, 29 जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने सेलिना जेटली को केंद्र सरकार द्वारा दाखिल स्थिति रिपोर्ट के जवाब में अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी थी। उन्होंने अदालत के समक्ष यह आग्रह किया था कि कुछ नए तथ्यों को रिकॉर्ड पर लाना आवश्यक है, जो उनके भाई की हिरासत से जुड़े हैं।
इस मामले में 23 दिसंबर को चैम्बर हियरिंग के बाद हाईकोर्ट ने कुछ नए निर्देश भी जारी किए थे। इससे पहले, न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने यह दर्ज किया था कि पूर्व आदेशों के अनुपालन में मेजर जेटली को निरंतर कांसुलर एक्सेस (दूतावासी सहायता) मिल रही है। सुनवाई के दौरान सेलिना जेटली ने यह भी अनुरोध किया था कि उनके भाई के लिए किसी स्थानीय वकील या लॉ फर्म की व्यवस्था की जाए, जिससे प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अदालत ने निर्देश दिया था कि भारतीय वाणिज्य दूतावास, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को स्थानीय रूप से मान्यता प्राप्त वकीलों या लॉ फर्मों की सूची उपलब्ध कराए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि किसी भी वकील या लॉ फर्म की नियुक्ति का खर्च बंदी या उसके परिवार को वहन करना होगा और यह शर्त स्पष्ट रूप से उसे बताई जानी चाहिए।
साथ ही, न्यायमूर्ति दत्ता ने यह भी कहा था कि यदि कोई वकील या लॉ फर्म पेशेवर शुल्क माफ करने को तैयार है, तो यह जानकारी भी मेजर जेटली को दी जानी चाहिए, ताकि वह सूचित निर्णय ले सकें। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि संबंधित वकील या फर्म का नाम विशेष रूप से उन्हें बताया जाए।
इससे पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह विदेश मंत्रालय के माध्यम से सेलिना जेटली और उनके भाई के बीच संवाद को सुगम बनाए। अदालत ने नोडल अधिकारी की नियुक्ति, परिवार को नियमित अपडेट देने, कांसुलर एक्सेस बनाए रखने और बंदी, उसकी बहन व पत्नी के बीच संचार सुनिश्चित करने के आदेश दिए थे।
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