‘ब्राह्मोफोबिया’ को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस

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ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित हेट स्पीच – “ब्राह्मोफोबिया”

सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित हेट स्पीच को “ब्राह्मोफोबिया” घोषित कर दंडनीय अपराध बनाने की मांग वाली रिट याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उचित मंच पर जाने की अनुमति देते हुए याचिका वापस लेने की इजाजत दी।


सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित हेट स्पीच को “ब्राह्मोफोबिया” बताते हुए इसे जाति आधारित भेदभाव के तहत दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग वाली रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। संक्षिप्त सुनवाई के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

याचिका महालिंगम बालाजी द्वारा दायर की गई थी, जो स्वयं अदालत में पेश हुए थे। बाद में उन्होंने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी ताकि वह अपनी मांगों को उचित मंच पर उठा सकें। सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए याचिका को वापस ली गई मानकर खारिज कर दिया।


अदालत की टिप्पणी: किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत भरी भाषा स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे सामाजिक मुद्दों का समाधान अदालतों के बजाय समाज में जागरूकता, शिक्षा और आपसी भाईचारे से होना चाहिए।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में सहनशीलता, बौद्धिक विकास और धैर्य की आवश्यकता है। जब समाज में भाईचारा बढ़ेगा तो नफरत भरी भाषा अपने आप कम हो जाएगी।


याचिका में क्या-क्या मांगे की गई थीं

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषणों को आधिकारिक रूप से जाति आधारित भेदभाव के तहत दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। साथ ही मुख्यधारा मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों में तत्काल कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग भी की गई थी।

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याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि केंद्र और राज्य की एजेंसियां मिलकर जांच करें कि क्या देश के अंदर या बाहर से कोई संगठित अभियान चलाया जा रहा है जिसका उद्देश्य जातीय संघर्ष भड़काना या ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाना है।


‘ट्रुथ एंड जस्टिस कमीशन’ बनाने की मांग

याचिका में केंद्र सरकार से एक उच्च स्तरीय “Truth & Justice Commission” बनाने की भी मांग की गई थी। इस आयोग से 1948 के महाराष्ट्र ब्राह्मण हत्याकांड और 1990 के कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की जांच कराने, उन्हें आधिकारिक रूप से मान्यता देने तथा पीड़ितों के पुनर्वास, आर्थिक सहायता और शिक्षा से जुड़े सुझाव देने की मांग की गई थी।

इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया था कि NCERT और राज्य बोर्ड की किताबों में महाराष्ट्र ब्राह्मण जनसंहार, 1984 सिख दंगे और 1990 कश्मीरी पंडितों के पलायन या नरसंहार पर अलग अध्याय शामिल किए जाएं। साथ ही स्मारक संग्रहालय बनाए जाएं और 19 जनवरी को “Genocide Victims Solidarity Day” घोषित किया जाए।


सरकारी अधिकारियों और NGOs के लिए आचार संहिता की मांग

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि यदि कोई सरकारी अधिकारी या संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ब्राह्मणों के खिलाफ जाति आधारित नफरत फैलाता पाया जाए तो उसे अयोग्य घोषित किया जाए। इसके अलावा गैर-सरकारी संगठनों के लिए भी एक आचार संहिता बनाने की मांग की गई थी ताकि जाति आधारित नफरत भरी भाषा पर रोक लगाई जा सके।

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याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार से ब्राह्मणों के खिलाफ कथित नफरत और भेदभाव के मुद्दों पर एक “व्हाइट पेपर” जारी करने की भी मांग की थी।


अदालत ने कहा – यह सही मंच नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि केवल एक समुदाय ही अपने लिए अलग से सुरक्षा क्यों मांग रहा है। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, लेकिन इस तरह की व्यापक नीतिगत और सामाजिक मांगों के लिए अदालत उचित मंच नहीं है।

अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी चिंताओं को उचित सरकारी या विधायी मंच पर उठा सकते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समाज में सद्भाव और भाईचारा बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी और याचिका को वापस ली गई मानकर खारिज कर दिया।


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