Parole vs Bail: पैरोल और बेल दोनों शब्दों में क्या है अंतर, आखिर इसके क्या है कानूनी दांव पेंच

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HIGHLIGHTS

  • कस्टडी और रेगुलर पैरोल
  • किसी अपराध के कारण से जेल जाता है
  • थाने का इंचार्ज बेल बांड भरवाने के बाद आरोपी को जमानत दे सकता

Parole vs Bail

 पैरोल और बेल आपराधिक न्याय प्रणाली का एक अहम हिस्सा है। आपने अकसर इन दोनों शब्दों के बारे में काफी सुना होगा। जब कोई व्यक्ति किसी मामले में गिरफ्तार हो जाता है तो उसे बेल और पैरोल मिलता है। ऐसे कई कानून की प्रणाली है, उनके बारे में जानना बेहद जरूरी है। आज आपको इस लेख के माध्यम से पैरोल और बेल के बार में बताएंगे। 

पैरोल आमतौर पर अच्छे व्यवहार के बदले में सजा खत्म होने से पहले एक कैदी की अस्थाई या अस्थाई रिहाई को कहा जाता है। यानी आसान भाषा में समझे कि अगर किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया है, अपराध करने के बाद उसे पुलिस ने गिरफ्तार करके 24 घंटे के अंदर कोर्ट या मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर करती है और इसके बाद अपराध के मुताबिक, उसे कोर्ट सजा सुनाती है जिसके बाद वह जेल चला जाता है।

जब अपराधी की सजा पूरी नहीं हुई हो या समाप्त होने वाली हो। उससे पहले ही अस्थाई रूप से अपराधी को रिहा कर दिया जाए तो उसे पैरोल कहते हैं। अगर व्यक्ति जेल के भीतर किसी अवैध कामों में पाया जाता है तो उसे पैरोल नहीं मिल सकती है। पैरोल उन्हीं को मिलती है, जो सजा के दौरान अच्छे व्यवहार के साथ जेल में समय बिताते हैं। 

भारत में पैरोल के लिए आवेदन कैसे करते हैं 

1894 के जेल अधिनियम और 1990 के कैदी अधिनियम के अनुसार, भारत में पैरोल के पुरस्कार को नियंत्रित करते हैं। अलग-अलग राज्यों में पैरोल को लेकर अपना एक अलग दिशा निर्देश सेट होता है। उदाहरण के तौर पर (बॉम्बे फरलो या पैरोल) नियम 1958 कारागार अधिनियम 1984 की धारा 59 (5) के तहत जारी किया गया था। ‌

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पैरोल दो तरह की होती है

कस्टडी और रेगुलर पैरोल। राज्य के खिलाफ अपराधों के दोषी या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाले गैर भारतीय नागरिक और अन्य पैरोल के लिए पात्र की श्रेणी में नहीं आते हैं। हत्या, बच्चों के बलात्कार, कई हत्या और अपराधों के दोषी लोगों को तब तक राहत दी जाती है जब तक कि जारी करने वाला प्राधिकारी कोई अन्यथा में ना लें। 

बेल क्या होता है 

जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के कारण से जेल जाता है तो उस शख्स को जेल से छुड़वाने के लिए न्यायालय या पुलिस से जो आदेश मिलता है उस आदेश को बेल कहते हैं। वही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बेल के लिए अप्लाई करने से पहले यह जानना बहुत ही आवश्यक होता है कि जिस व्यक्ति के लिए आप बेल अप्लाई करने जा रहे हैं उसने कैसा अपराध किया है। इसे लेकर जमानत का प्रावधान क्या है। आपको बता दें कि कानून के अनुसार क्राइम दो प्रकार के होते हैं। एक जमानती और दूसरा गैर जमानती। 

जमानती अपराध

इसमें आमतौर पर मारपीट और लापरवाही से वाहन चलाना जैसे मामले शामिल हैं। यह मामले इस तरह के है कि जिसमें 3 साल या उससे कम की सजा का प्रावधान है। सीआरपीसी की धारा 436 के तहत जमानती अपराध में कोर्ट द्वारा जमानत दे दी जाती है। वहीं कुछ परिस्थितियों में सीआरपीसी की धारा 159 के तहत थाने से ही जमानत दिए जाने का भी प्रावधान है। आपको बता दें कि गिरफ्तारी होने पर थाने का इंचार्ज बेल बांड भरवाने के बाद आरोपी को जमानत दे सकता। 

इन अपराधों के लिए नहीं मिलते हैं बेल 

व्यक्ति ने किस प्रकार का अपराध किया है यह जानना पहले बेहद जरूरी होता है। की गंभीरता को देखते हुए भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के कुछ ऐसे अपराधों को गैर जमानती अपराध की लिस्ट में शामिल किया गया है। यानी आपको बता दें कि कुछ ऐसे गंभीर अपराध है जिन्हें गैर जमानती अपराध माना जाता है। अगर कोई व्यक्ति रेप, अपहरण, लूट, डकैती, हत्या हत्या की कोशिश, गैर इरादतन हत्या और फिरौती के लिए अपहरण जैसे क्राइम करता है तो उसे बेल नहीं मिल सकती है। इन अपराधों में अपराधी को खास तौर पर फांसी की सजा या उम्र कैद की सजा सुनाई जाती है, जिसके कारण कोर्ट से भी इन अपराधों के लिए बेल नहीं मिलती। 

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बेल कितने प्रकार के होते हैं

ज्ञात हो की सीआरपीसी में दो बेल के बारे में बताया गया है।

अग्रिम जमानत

और दूसरा रेगुलर बैल

अग्रिम यानी एडवांस, अगर किसी व्यक्ति के बारे में वह किसी मामले में गिरफ्तार हो सकता है तो गिरफ्तारी से बचने के लिए वह व्यक्ति सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत की अर्जी को कोर्ट में दाखिल करता है। अगर कोर्ट अग्रिम जमानत को इजाजत दे देता है तो अगले आदेश तक व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। सीआरपीसी की धारा 439 रेगुलर बेल का भी प्रावधान है, जब किसी आरोपी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में मामला पेंडिंग होता है तो वह आरोपी बेल के लिए अर्जी लगा सकता है।