शीर्ष अदालत ने कहा, “हम हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं कि ये आरोप केवल तैयारी दर्शाते हैं, दुष्कर्म का प्रयास नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें दुष्कर्म के प्रयास को ‘सिर्फ तैयारी’ माना गया था। POCSO व IPC 376 के तहत समन बहाल, जजों में संवेदनशीलता हेतु गाइडलाइंस बनाने के निर्देश।
यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर अहम टिप्पणी करते हुए Supreme Court of India ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के फैसले को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने दो आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) के आरोपों को कम गंभीर अपराध में बदलते हुए कहा था कि कथित कृत्य “तैयारी” (Preparation) की श्रेणी में आते हैं, “प्रयास” (Attempt) में नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस निष्कर्ष से असहमति जताते हुए कहा कि आरोपित घटनाक्रम “सिर्फ तैयारी” से कहीं आगे जाता है।
अदालत ने कहा, “इन आरोपों के साधारण अवलोकन से स्पष्ट है कि आरोपियों ने पूर्व-नियत मंशा के साथ IPC की धारा 376 के तहत अपराध करने की दिशा में कदम बढ़ाए।”
मूल समन आदेश बहाल
शीर्ष अदालत ने Allahabad High Court के 17 मार्च 2025 के निर्णय को निरस्त करते हुए विशेष न्यायाधीश (POCSO), कासगंज द्वारा 23 जून 2023 को जारी समन आदेश बहाल कर दिया।
मामले में आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 376 के साथ POCSO अधिनियम की धारा 18 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के आरोप लगाए गए थे।
घटना के तथ्य क्या थे?
रिकॉर्ड के अनुसार, आरोप है कि आरोपियों ने नाबालिग पीड़िता को घर छोड़ने के बहाने मोटरसाइकिल पर बैठाया, सुनसान स्थान—एक पुलिया (culvert) के पास—रोककर उसे नीचे खींचा और उसके साथ यौन आपत्तिजनक कृत्य किए।
अदालत ने उल्लेख किया कि पीड़िता की चीख सुनकर गवाहों के मौके पर पहुंचने के कारण अपराध आगे नहीं बढ़ सका।
शीर्ष अदालत ने कहा, “हम हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं कि ये आरोप केवल तैयारी दर्शाते हैं, दुष्कर्म का प्रयास नहीं।”
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां प्रथमदृष्टया (prima facie) हैं और ट्रायल के मेरिट पर प्रभाव नहीं डालेंगी।
स्वत: संज्ञान और व्यापक संदेश
यह मामला सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान (suo motu) लेते हुए उठाया था। 20 मार्च 2025 को ‘We the Women of India’ संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Shobha Gupta द्वारा भेजे गए पत्र में हाईकोर्ट के तर्क को “कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण, असंवेदनशील और महिलाओं की सुरक्षा के प्रयासों को हतोत्साहित करने वाला” बताया गया था।
शीर्ष अदालत ने पहले ही हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी और निर्देश दिया था कि मुकदमा IPC की धारा 376/511 और POCSO की धारा 18 के तहत जारी माना जाए।
न्यायिक संवेदनशीलता पर गाइडलाइंस
महत्वपूर्ण रूप से, सुप्रीम कोर्ट ने National Judicial Academy, भोपाल को निर्देश दिया कि वह पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश Aniruddha Bose की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित करे।
इस समिति का उद्देश्य यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में “संवेदनशीलता और करुणा” विकसित करने हेतु मसौदा दिशानिर्देश तैयार करना होगा। अदालत ने कहा कि यह अभ्यास तीन महीने के भीतर पूरा किया जाए।
व्यापक प्रभाव
यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि यौन अपराधों में “तैयारी” और “प्रयास” के बीच की रेखा को तथ्यों के आलोक में संवेदनशीलता से समझना होगा। अदालत ने संकेत दिया कि जहां अपराध की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हों, वहां तकनीकी व्याख्या से आरोपों को हल्का नहीं किया जा सकता।
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