सिर्फ कयासों पर नहीं हो सकती सजा: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की हत्या के आरोप में महिला को बरी किया

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🧾विधि संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की एक महिला को अपने दो बच्चों की हत्या के मामले में बरी कर दिया है, यह पाते हुए कि केवल एक दुकान मालिक की गवाही, जो स्वयं अविश्वसनीय और अप्रत्यक्ष (हियरसे) साक्ष्य थी, के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।

⚖️ उच्च न्यायालय का फैसला पलटा

यह अपील छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के द्वैपीठ द्वारा दिए गए उस निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें महिला को IPC की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।

हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया:

“PW-2 (दुकान मालिक) की गवाही को छोड़कर, आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। PW-2 की गवाही विरोधाभासी, संशोधित और अत्यधिक अविश्वसनीय है। अधिकतम, इसे ‘हियरसे’ यानी सुनी-सुनाई बातों पर आधारित कहा जा सकता है।”

🔎 मामला संक्षेप में

  • PW-2 संतोष कुमार पांडे, जो एक बीटल पान की दुकान चलाते थे, ने दावा किया कि उन्होंने महिला को अपने दो बच्चों (2 वर्ष और 4 माह की उम्र के) के साथ एक जलाशय (पुजारी तालाब) की ओर जाते हुए देखा।
  • उनका कहना था कि महिला “विचलित अवस्था” में थी, जिससे उन्हें संदेह हुआ।
  • पास के एक रिक्शा चालक ने बताया कि दो बच्चे पानी में तैरते दिखाई दिए।
  • बाद में PW-2 ने महिला को रेलवे ट्रैक की ओर जाते हुए देखा और दावा किया कि उसने महिला को ट्रेन की चपेट में आने से बचाया।
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महिला पर पति से झगड़े के चलते बच्चों को मारने का आरोप था। FIR दर्ज हुई, और निचली अदालत ने सजा सुनाई, जिसे उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की गई, जिसमें अंतरिम ज़मानत भी प्रदान की गई थी।

🔍 सुप्रीम कोर्ट की कानूनी विश्लेषण

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) पर आधारित है। लेकिन:

  • PW-2 की मुख्य गवाही और पुलिस में दिए बयान (धारा 161 CrPC के तहत) के बीच स्पष्ट विरोधाभास था।
  • क्रॉस-एक्जामिनेशन में स्पष्ट हुआ कि उन्होंने कोर्ट में नया कथन गढ़ा, जो पुलिस बयान में नहीं था।
  • न्यायालय ने कहा:

“PW-2 की गवाही पूरी तरह संशोधित और अविश्वसनीय है। ऐसे में निचली अदालत और उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया दोष सिद्धि का निर्णय केवल अटकलों और कयासों पर आधारित है, जो कि कानून के अनुसार टिकाऊ नहीं है।”

⚖️ अंतिम निष्कर्ष

पीठ ने कहा:

“हम यह मानते हैं कि अपील स्वीकार की जानी चाहिए। दोष सिद्धि कानून के अनुसार टिकाऊ नहीं है और सिर्फ संदेह या परिस्थितियों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

इस प्रकार, महिला को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए पूरी तरह बरी कर दिया गया

🧷 केस विवरण

  • मामला: Shail Kumari v. State of Chhattisgarh
  • न्यूट्रल साइटेशन: 2025 INSC 936
  • अपीलकर्ता की ओर से: AOR ननिता शर्मा
  • उत्तरदाता की ओर से: अधिवक्ता प्रेरणा ढल

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