NCERT विवाद: ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर लेखकों ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया
कक्षा 8 की NCERT किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय को लेकर विवाद पर लेखकों ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया; कोर्ट ने व्यापक समीक्षा और नई समिति के गठन पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में लेखकों की सफाई दाखिल
कक्षा 8 की NCERT सामाजिक विज्ञान की किताब में शामिल “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” उप-अध्याय को लेकर चल रहे विवाद में अहम मोड़ आया है। इस अध्याय को तैयार करने वाली टेक्स्टबुक डेवलपमेंट टीम के तीन शिक्षाविदों—सुपर्णा दिवाकर, मिशेल डैनिनो और आलोक प्रसन्न कुमार—ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना स्पष्टीकरण दाखिल कर दिया है।
सोमवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं गोपाल शंकरनारायणन, अरविंद दातार और जे. साई दीपक ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश होकर अनुरोध किया कि इन स्पष्टीकरणों को अगली सुनवाई में लिया जाए।
ब्लैकलिस्ट टिप्पणी से साख पर असर—वकीलों की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने अदालत से आग्रह किया कि वह शिक्षाविदों के जवाबों पर विचार करे, क्योंकि पहले की टिप्पणियों—जिनमें उन्हें अकादमिक कार्यों से अलग करने की बात कही गई थी—से उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ा है।
उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा नीति के तहत संस्थागत चुनौतियों पर चर्चा करना पाठ्यक्रम का हिस्सा है। नई शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार कक्षा 6-7 के पाठ्यक्रम में भी विधायिका, चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाता है।
‘यह सामूहिक निर्णय था’—लेखकों का पक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक ने अदालत को बताया कि शिक्षाविदों द्वारा दाखिल आवेदन का सार यह है कि संबंधित अध्याय का निर्माण एक सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा था और किसी एक व्यक्ति का अंतिम निर्णय नहीं था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पाठ्यपुस्तक निर्माण में कई स्तरों पर समीक्षा होती है और यह कहना गलत होगा कि किसी एक लेखक की व्यक्तिगत भूमिका निर्णायक थी।
नई समिति और पाठ्यक्रम समीक्षा का दायरा बढ़ा
सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है, जिसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा, वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल और एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह शामिल हैं।
यह समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल के साथ मिलकर कक्षा 8 और उससे ऊपर के लिए विधिक अध्ययन पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति का कार्यक्षेत्र केवल विवादित अध्याय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सभी संबंधित पहलुओं की व्यापक समीक्षा करेगा।
NCERT ने भी उच्चस्तरीय समिति का पुनर्गठन किया
अदालत के समक्ष यह जानकारी भी रखी गई कि NCERT ने 2 अप्रैल को एक अधिसूचना जारी कर राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शिक्षक प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का पुनर्गठन किया है। इस समिति में 20 प्रतिष्ठित सदस्य शामिल हैं।
पहले के आदेश और जारी कार्यवाही
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे इन तीनों शिक्षाविदों को किसी भी सार्वजनिक वित्तपोषित अकादमिक कार्य से तत्काल अलग करें। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया था कि यह निर्देश उनके स्पष्टीकरण पर निर्भर करेगा।
अदालत ने शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव और NCERT निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था, जिसमें पूछा गया था कि विवादित अध्याय तैयार करने वालों के खिलाफ अवमानना या अन्य कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाए।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख बरकरार
गौरतलब है कि NCERT द्वारा माफी मांगने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) कार्यवाही को रोकने से इनकार कर दिया था। साथ ही, विवादित कक्षा 8 की पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।
अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि उसके आदेश को दरकिनार करने की किसी भी कोशिश को न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाएगा और इसे अवमानना के रूप में देखा जाएगा।
निष्कर्ष: शिक्षा सामग्री और संस्थागत संतुलन पर बहस तेज
यह मामला शिक्षा सामग्री में संस्थागत आलोचना की सीमा, अकादमिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण परीक्षण बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का रुख यह संकेत देता है कि पाठ्यपुस्तकों में संवेदनशील विषयों को शामिल करते समय पारदर्शिता, जिम्मेदारी और संतुलन आवश्यक है।
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