सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A IPC और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज FIR को रद्द करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन के सामान्य उतार-चढ़ाव को ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने झूठे और अस्पष्ट आरोपों पर आपराधिक मुकदमे से राहत दी।
धारा 498A का दुरुपयोग नहीं होगा बर्दाश्त: सुप्रीम कोर्ट ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर पति पर दर्ज FIR रद्द की
वैवाहिक जीवन के सामान्य मतभेद ‘क्रूरता’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को एक अहम फैसले में धारा 498A IPC और दहेज निषेध अधिनियम के कथित दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए तेलंगाना में दर्ज एक आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेलिडे स्वगथ कुमार की अपील स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़े सभी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
हाईकोर्ट के आदेश को किया गया निरस्त
शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें पति के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया गया था। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट पहले ही अप्रैल 2025 में पति के माता-पिता और भाई-बहनों (आरोपी संख्या 2 से 6) के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर चुका था, जबकि पति के खिलाफ मामला जारी रखा गया था।
मामला क्या था?
यह मामला एफआईआर संख्या 29/2022 से जुड़ा है, जो पत्नी नल्ला रश्मि ने अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज कराई थी। दोनों की शादी वर्ष 2016 में हुई थी और उनका एक पुत्र भी है। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी 2019 में अमेरिका से भारत लौट आई थी, जिसके बाद यह आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
पत्नी ने आरोप लगाया था कि—
- पति ने उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया,
- दहेज की मांग को लेकर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न किया,
- उसके वित्तीय मामलों पर नियंत्रण रखा,
- और प्रसव के बाद वजन बढ़ने को लेकर ताने मारे।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की गहन जांच के बाद कहा कि ये आरोप आपराधिक ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा—
“शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप वैवाहिक जीवन के दैनिक उतार-चढ़ाव को दर्शाते हैं और इन्हें किसी भी स्थिति में ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।”
‘एक्सेल शीट’ और वित्तीय नियंत्रण पर टिप्पणी
पत्नी द्वारा लगाए गए एक आरोप—कि पति ने उसे खर्चों का एक्सेल शीट बनाने के लिए मजबूर किया—पर कोर्ट ने कहा:
“यदि इस आरोप को प्रथम दृष्टया सही भी मान लिया जाए, तो भी यह धारा 498A के तहत क्रूरता की परिभाषा में नहीं आता।”
इसी तरह, वित्तीय नियंत्रण के आरोपों पर अदालत ने कहा कि—
“मात्र आर्थिक या वित्तीय प्रभुत्व, जब तक उससे कोई ठोस मानसिक या शारीरिक क्षति सिद्ध न हो, क्रूरता नहीं माना जा सकता।”
FIR को बताया ‘वाग और सामान्य’
कोर्ट ने एफआईआर की भाषा और सामग्री पर भी गंभीर सवाल उठाए। फैसले में कहा गया—
“एफआईआर का सामान्य अवलोकन यह दर्शाता है कि आरोप अस्पष्ट और सामान्य (vague and omnibus) हैं। दहेज उत्पीड़न के कथन के अलावा शिकायतकर्ता ने किसी विशिष्ट घटना या ठोस विवरण का उल्लेख नहीं किया है।”
भजन लाल केस का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने State of Haryana v. Bhajan Lal (1992) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला उन श्रेणियों में आता है, जहां अदालत को अपवादस्वरूप आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। कोर्ट ने माना कि आरोप दुर्भावनापूर्ण (mala fide) हैं और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है।
498A के दुरुपयोग पर चेतावनी
फैसले में एक बार फिर धारा 498A के दुरुपयोग को लेकर चेतावनी दी गई। कोर्ट ने दोहराया—
“ऐसे मामलों में अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि कानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग न हो और निर्दोष परिवारजनों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके।”
अंतिम आदेश
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने—
- पति की अपील स्वीकार की,
- तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त किया, और
- एफआईआर संख्या 29/2022 तथा उससे जुड़ी शिकायत संख्या 1067/2022 को पूरी तरह रद्द कर दिया।
केस विवरण
- केस टाइटल: Belide Swagath Kumar v. State of Telangana & Another
- साइटेशन: 2025 INSC 1471
वैवाहिक विवादों को आपराधिक कानून का रंग देना न्याय के हित में नहीं है, और धारा 498A का प्रयोग सोच-समझकर किया जाना चाहिए।
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